सपा-कांग्रेस गठबंधन एक दूसरे की सियासी मजबूरी

अनंत कुशवाहा 
आलापुर, अम्बेडकरनगर। आगामी विधानसभा चुनाव में सूबे की सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस का सियासी गठबंधन एक दूसरे की सियासी मजबूरी भी है। समाजवादी पार्टी जहां पारिवारिक कलह के उपरांत नए नेतृत्व के रूप में सामने आई है और पिता मुलायम सिंह यादव की नाराजगी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखरने के अंदेशे ने सपा की नजदीकियां कांग्रेस की तरफ बढ़ा दी। वहीं प्रदेश में वेंटीलेटर पर पहुंच चुकी कांग्रेस पार्टी अपने जनाधार को बचाए रखने के लिए गठबंधन के रास्ते को

चुना है।सपा कांग्रेस का गठबंधन एक दूसरे के लिए मुफीद साबित हो सकता है दोबारा प्रदेश की सत्ता पाने के लिए अखिलेश यादव गठबंधन को सीढ़ी के रुप में इस्तेमाल करते हुए नजर आ रहे हैं।प्रदेश के चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है उसने प्रदेश में दोनों ही पार्टियों के बड़े वर्ग को निराश किया है, एक तरफ जो सपा उम्मीदवार इस बात की उम्मीद लगाएं बैठे थे कि पार्टी उन्हें टिकट देगी उसने इस गठबंधन के बाद उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। वहीं कांग्रेस के वो जमीनी कार्यकर्ता जो उम्मीद लगाए थे कि इस बार वह प्रदेश में खुद फिर से खड़ा करने में सफलता हासिल करेगी वह भी काफी निराश हैं।

यूपी में सपा-कांग्रेस के गठबंधन को मतलब की राजनीति का गठबंधन कहा जा रहा है, दोनों दल अपनी जरूरतों के हिसाब से एक दूसरे के साथ आए हैं। कांग्रेस के सामने यूपी चुनाव अस्तित्व की लड़ाई हैं, इस चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है खुद के अस्तित्व को बनाए रखना, जबकि समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कैसे वह परिवार के विवाद के बाद विघटित मुस्लिम वोट को एक बार फिर से अपनी ओर खींच सके। सपा में जिस तरह से परिवार का विवाद चल रहा था उसने दूसरे दलों को फायदा पहुंचाया, इस विवाद के चलते बसपा ने तकरीबन 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया और मुसलमानों से उनका वोट व्यर्थ नहीं करने की अपील की। सपा-कांग्रेस के गठबंधन से दोनों की पार्टियों को कई लाभ हैं तो कई फायदे भी, लेकिन इन लाभ और फायदों को ध्यान में रखते हुए ही दोनों दल गठबंधन के लिए राजी हुए हैं। समाजवादी पार्टी के को इस गठबंधन से जो सबसे बड़ा फायदा होगा वह यह कि प्रदेश के मुसलमान के पास एक बार फिर से बड़ा विकल्प मिल गया है और मुस्लिम समुदाय इस गठबंधन को जीतता हुआ देख सकता है और वह अपना वोट इस गठबंधन को दे। ऐसे में प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक के बंटने की संभावना भी कम है। लेकिन पार्टी को जो सबसे बड़ा नुकसान इस गठबंधन से हो सकता है वह यह कि अखिलेश यादव को खुद के काम और खुद की छवि पर भरोसा नहीं रहा। इस गठबंधन से यह संदेश लोगों के बीच जा सकता है कि अखिलेश यादव खुद की जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है और उस पार्टी के साथ गठबंधन के लिए राजी हो गए जो उनके कामों की जमकर आलोचना करती रही, यहां तक कि कांग्रेस ने इस चुनाव का नारा ही 27 साल यूपी बेहाल दिया था। यूपी का चुनाव कांग्रेस के नजरिए से बहुत ही अहम है, अगर यूपी के चुनाव में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ता है तो उसके लिए 2019 का चुनाव बेहद ही मुश्किल हो सकता था, लिहाजा इस चुनाव में गठबंधन के बाद अगर पार्टी प्रदेश में सरकार का हिस्सा बनने में सफल हुई तो वह उसके लिए बड़ी सफलता साबित हो सकता है। पार्टी अपने एजेंडे को प्रदेश में बढ़ा सकती है और केंद्र में खुद को मजबूती से आगे बढ़ा सकती है। कांग्रेस को इस गठबंधन के बाद अखिलेश यादव के नाम पर वोट मिलने की संभावना बढ़ सकती है और अल्पसंख्यकों का भी वोट उसे बड़ी संख्या में हासिल हो सकता है लेकिन इस गठबंधन से कांग्रेस को जो सबसे बड़ा नुकसान होगा वह यह कि पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर से प्रदेश में अपना जादू बिखेरने में विफल रहे और पार्टी प्रदेश में फिर से खुद के दम पर खड़े होने से पहले ही कांग्रेस ने घुटने टेक दिए। यही नहीं पार्टी ने इस बात को भी स्वीकार कर लिया है कि उसे प्रदेश में बैशाखी की जरूरत है और वह अपने दम पर चुनाव नहीं लड़ सकती है। कुल मिलाकर आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा और बसपा से मजबूती से पार पाने के लिए सपा कांग्रेस का गठबंधन एक दूसरे की सियासी मजबूरी होते हुए मजबूती की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है अब देखने वाली बात यह होगी कि विधानसभा चुनाव मैं सपा कांग्रेस गठबंधन क्या गुल खिलाता है और यह सियासी गठबंधन कहां तक टिकता है।

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