कानपुर – रेलबाज़ार के न्यू गन्दा लोको गेट पर चलता यह जुआ अड्डा जहा आज भी जिन्दा है कुख्यात गुलाम नबी का नाम

वीनस दीक्षित के साथ समर रुदौलवी की एक पड़ताल.
कानपुर. जुआ सभ्य समाज के लिए एक कलंक है, ना जाने कितने घर इसके लत से तबाह हो गए, शोर्ट कट में पैसा कमाने कि ललक इस जुवे के अड्डे तक इंसानों को खीच कर ले जाती है मगर उसके बाद शुरू होता है बर्बादी और तबाही का दौर. इंसान अपने पहले हारे हुवे पैसो को दुबारा कमाने के लिए दाव पर दाव खेलता जाता है और शुरू हो जाता है तबाही और बर्बादी का एक दौर जो लगातार चलता रहता है. आकड़ो की अगर बात करे तो इस लत से परेशान इंसान क़र्ज़ के बोझ में डूब कर या तो अपना सब कुछ तबाह कर लेता है या फिर मौत को गले लगा लेता है. जुआ केवल कानूनन अपराध नहीं इसको आप सामाजिक अपराध की श्रेणी में भी रख सकते है, इसको खेल्वाने वाला दूसरो की तिजोरी का माल अपने तिजोरी में भरता जाता है और दूसरो के जीवन का अर्थ जी नहीं उसके ज़िन्दगी की सांसे भी कम करता जाता है. ये एक ऐसे स्लो पाईज़न का काम करता है जिसका उठता नहीं बल्कि उठ जाता है.

हमारी पड़ताल को अब एक क्षेत्रिय समाजसेवक का साथ मिल चूका था, उन्होंने हमको अपनी पहचान गुप्त रखने के शर्त पर अन्य जुआ अड्डे तक घुमाने का वायदा कर लिया. हम उनके साथ रेल बाज़ार के सुजातगंज के तरफ आ चुके थे. यहाँ न्यू गन्दा लोको गेट रेलवे कालोनी पहुच चुके थे. यहाँ टूटी कालोनी के एक फ़्लैट जो खाली पड़ा है वहा देखा कि किताब चल रही है. खूब तगड़ा जमावड़ा लगा हुआ था. किताब यानी ताश के पत्तो का खेल हर पत्ते पर लम्बी रकम लग रही थी. एक एक दाव हज़ारो का हो रहा था. खिलाड़ी भी जमकर बैठे थे. यहाँ का माहोल किसी कैसीनो से कम नहीं लग रहा था. हर प्रकार कि सुविधा उपलब्ध थी. हमको इस माहोल से तुरंत बाहर निकलना ही बेहतर लगा. हमारा यहाँ का काम हो चूका था. हमारा स्पाई कैमरा अपना काम कर चूका था. हम बाहर आकर इसकी तफ्तीश में जुट गए कि आखिर इतना बड़ा जुआ अड्डा और पुलिस चौकी के इतने नज़दीक आखिर माजरा क्या है कि पुलिस को किसी क्षेत्रिय जनता ने सूचना तक नहीं दिया.
हमने जानकारी इकठ्ठा करना शुरू किया तो सूत्रों की सूचनाओ और क्षेत्रिय चाय पान की दुकानों पर चर्चाओ के अनुसार इसका सञ्चालन आकाश नमक एक व्यक्ति करवाता है जिसकी कथित अच्छी पैठ प्रशासन में है. इसको साथ मिला कुख्यात अपराधी रह चूका गुलाम नबी का. गुलाम नबी के डर से कोई आवाज़ नहीं उठाता था. इसकी साझेदारी चल निकली और दोनों ने खूब पैसे इस अवैध कारोबार से कमाये. इसी बीच विगत पखवारे गुलाम नबी की ह्त्या हो गई. क्षेत्रिय चर्चाओ के अनुसार दबंग प्रवृत्ति का हिष्ट्रीशीटर गुलाम नबी की हत्या के बाद कोई सर न उठा सके इसके लिए इसने सुधीर नाई म के युवक का साथ पकड़ा और अब गुलाम नबी के नाम को अभी तक कैश किया जा रहा है. एक क्षेत्रिय नागरिक ने दबी ज़बान में कहा कि अपराधिक छवि का गुलाम नबी मारा गया है उसके साथी तो अभी भी है न.
सारा खेल समझ आ चूका था. एक अपराधी के बल पर क्षेत्रिय नागरिको के दिलो में दहशत पैदा करके खौफ का ये खेल चल रहा था. आम नागरिक इस खौफ से इसकी सुचना पुलिस को देगे नहीं न ही किसी से कोई चर्चा करेगे और न पुलिस को भनक लगेगी. मगर साहेब इसमें सिर्फ एक बात नहीं समझ आई. चलिए हम मान लेते है कि पुलिस को यहाँ लम्बे समय से हो रहे इस गोरखधंधे की जानकारी नहीं है. फिर कैसी पोलिसिंग और मुखबिरों का नेटवर्क है स्थानीय पुलिस चौकी का. मानते है कि थाना क्षेत्र काफी बड़ा है तो थाना प्रभारी के कान तक हर बात पहुचना संभव नहीं प्रतीत होता है. जब तक उनको किसी के द्वारा शिकायत नहीं मिलती है. मगर स्थानीय पुलिस चौकी पर लम्बे लम्बे समय से जमे कांस्टेबलो को जानकारी नहीं और किसी मुखबीर ने सुचना नहीं दिया ये कुछ समझ के परे है. इसके लिए तो जानकर यही कहेगे कि मुख्बीरो का जाल तगड़ा नहीं है.
चलिए देखते है साहेब कि कब तक खबर का असर होता है. वैसे कल की हमारी खबर का यह असर था कि प्रकरण कि जांच कैन्ट क्षेत्राधिकारी के हवाले कर दिया गया है. अब देखना है कि यह जांच कितनी कागजों पर दौड़ती है और कितनी सडको और गलियों में. हमारा काम है सच दिखाना और स्थानीय प्रशासन का काम है जांच करना. अब लोकतंत्र के दोनों प्रहरी अपने अपने काम में लगे हुवे है. ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर 

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