‬शहीद आयतुल्लाह शैख़ निम्र का ख़ून व्यर्थ नहीं जाएगा, यह अपराध आले सऊद का कभी पीछा नहीं छोड़ेगा

आदिल अहमद : आफ़ताब फ़ारूक़ी

आयतुल्लाह शैख़ निम्र बाक़िर अन्निम्र वह अमर नाम है जो सऊदी अरब ही नहीं पूरी इस्लामी दुनिया में निर्भीकता और साहस के पर्याय बन गए।

वरिष्ठ सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की निर्मम हत्या के बाद सऊदी सरकार की दरिंदगी पर सारी दुनिया में हंगामा मचा लेकिन यह सच्चाई सारी दुनिया जानती है कि आले सऊद शासन की शुरू से ही बड़ी निर्ममता से शासन कर रहा है और विरोध में उठने वाली हर आवाज़ तथा आलोचना के हर स्वर को दबा देना उसकी पुरानी रणनीति है। आयतुल्लाह शैख़ निम्र बाक़िर अन्निम्र सऊदी अरब के वरिष्ठ धर्म गुरू थे जो जनता के विषयों को उठाने और सरकार की ग़लत नीतियों तथा अत्याचारों की आलोचना करने को अपना कर्तव्य समझते थे।

शैख़ निम्र को सरकार की नीतियों पर आलोचना के दोष में गोली मार कर घायल कर दिया और गिरफ़तार कर लिया गया। उन्हें 1274 दिनों तक काल कोठरी में बंद रखा गया और फिर 2 जनवरी 2016 को तलवार से उनकी गर्दन उड़ा दी गई। उस समय उनकी उम्र 57 साल थी। उन्हें 8 जुलाई 2012 को गिरफ़तार किया गया था।

गिरफ़तारी के समय आयतुल्लाह निम्र को गोली मार कर घायल कर दिया गया था और सऊदी शासन ने जान बूझ कर उनका इलाज नहीं करवाया ताकि इस तरह भी उन्हें यातना दी जाए। कई दिनों बाद उनके शरीर में लगी तीन गोलियां निकाली गईं जबकि चौथी गोली जो उनकी जांघ में लगी थी उसे नहीं निकाला गया बल्कि उसी तरह छोड़ दिया गया। इसी कारण वह चल नहीं पाते थे।

शैख़ निम्र पर सऊदी शासन की ओर से देश की सुरक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाने, बहरैन के मामलों मे हस्तक्षेप करने और लोगों को प्रदर्शनों की दावत के आरोप लगाए गए।

मगर शैख़ निम्र को न तो आरोपों का डर था न ही यातनाओं की फ़िक्र थी उन्हें अपने दायित्वों के निर्वाह का चिंता था। शैख़ बाक़िर निम्र ने कभी भी हिंसा की बात नहीं की उन्होंने हमेशा मज़बूत इरादे के साथ अत्याचार से लड़ने की बात की और उनका कहना था कि हम अपने इरादे और ईमान से आपके अत्याचार का मुक़ाबला करेंगे और हारेंगे नहीं बल्कि डट रहेंगे आप ज़्यादा से ज्यादा यह कर सकते हैं कि हमारी जान ले लें तो हम शहादत का स्वागत करते हैं। क्योंकि मौत से ज़िंदगी ख़त्म नहीं होती बल्कि इंसान की असली ज़िंदगी तो मौत के बाद शुरू होती है।

अगर आज सऊदी अरब की हालत देखी जाए तो यह कहा जा सकता है कि मज़लूमी की हालत में अपनी जान की क़ुरबानी देने वाले शहीद बाक़िर निम्र की ख़ून व्यर्थ नहीं गया बल्कि वह रंग लाया। कुछ देर से ही सही मगर सऊदी सरकार का ख़ूखार चेहरा दुनिया में चर्चा का विषय बना और उसकी दरिंदगी की बातें वह देश भी करने लगे जो इससे पहले तक चुप रहना पसंद करते थे।

वैसे शैख़ बाक़िर निम्र की शहादत के बाद इस्लमी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने कहा था कि एक धर्मगुरु जो उपदेश देते थे जो धार्मिक गरिमा के स्वामी थे एसे इंसान को अगर क़त्ल कर दिया जाए उसे शहीद कर दिया जाए तो यह वाक़ई भयानक अपराध है। यह भयानक ग़लती भी है इसलिए कि यह अपराध इनका पीछा नहीं छोड़ेगा। सऊदी अरब के राजनेता, नीति निर्धारक और नीतियों को लागू करने वाले अधिकारी यह यक़ीन रखें कि यह अपराध उनका पीछा नहीं छोड़ेगा। उनको तबाह करके रख देगा। अल्लाह किसी भी बेगुनाह के ख़ून को माफ़ नहीं करता। जो लोग मानवाधिकारों के बड़े दावेदार हैं उनके मुंह पर ताले क्यों लग गए हैं वह कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं।

हिज़्बुल्लाह लेबनान के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह का कहना है कि सऊदी अरब के वरिष्ठ साहसी धर्मगुरू की शहादत और हत्या कोई मामूली घटना नहीं है जिसे भुला दिया जाए। शैख निम्र की सज़ाए मौत में यह संदेश है कि आले सऊद वह शासन है कि जो केवल आलोचना कर देने पर आलोचक की गरदन तलवार से काट देता है। आले सऊद का कहना है कि वह किसी भी समाज को और देश को तबाह कर सकते हैं लेकिन अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते। यदि हमारे देश में रहना है तो ख़ामोशी से जानवरों की तरह ज़िंदगी गुज़ारो वरना हम तुम्हें ज़िबह कर देंगे।

शैख़ निम्र एक सुधारवादी इंसान थे। वह अरब जनता के अधिकारों की बात करते थे। उनका कहना था कि सऊदी अरब की जनता का भी यह अधिकार है कि वह अपने अधिकारियों और नेताओं का चयन करे। उनकी मांग थी कि सऊदी अरब की दौलत राजकुमारों के हाथों लुटाए जाने के बजाए जनता को मिलनी चाहिए। वह उस आज़ादी की मांग करते थे जो दुनिया के हर इंसान की मांग होती है। वह अपनी मांग साहस के साथ करते थे। मगर सऊदी अरब में क़ानून है कि यदि किसी ने कुछ मांग की तो उसे मार दिया जाएगा। शैख़ बाक़िर निम्र का ख़ून आले सऊद का पीछा करता रहेगा दुनिया में भी और परलोक में भी।

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