ईद :  पैग़ाम-ए-मुहब्बत

डॉ मोहम्मद आरिफ

ईद-उल-फितर यानी ईद का नाम ज़ेहन में आते ही खुशी का एहसास होने लगता है वास्तव में ये ही इसका मक़सद भी  है। रमज़ान-उल-मुबारक के एक माह बाद ईद का चांद दिखलाई पड़ता है। जिससे हर रोज़ेदार के चेहरे खिल उठते है और चारों ओर मस्ती का आलम फैल जाता है।  रमज़ान के पूरे महीने इबादत और पाकीज़गी में गुज़ारने वाले नेक बंदों पर ख़ुदा मेहरबान  होता है।

क़ुरान में साफ-साफ लिखा है कि, ‘ऐ ईमान वालों रोज़े तुम पर फ़र्ज़ किये गए ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ। ईद का चांद निकलते ही एक-दूसरे को मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू होता है जो कि ख़ुशी के इज़हार का इंसानी तरीका है। ये इस बात का भी सबूत है के ख़ुदा ने हमारी इबादत क़ुबूल कर ली और हमे ईद का नायाब तोहफा अता किया। लोग अपनी जरूरतों की चीज़ की ख़रीदारी में लग जाते हैं। बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है। मानो उन्होंने ख़ुशी का समन्दर पा लिया हो। हर एक अमीर-ग़रीब, बच्चा -बूढ़ा ये सोचता है कि कैसे सुबह हो और नमाज़ अदा की जाए। लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ में बार-बार ये ही बात आती है कि ख़ुदा का  लाख-लाख शुक्र है कि जो उसने हमें रमज़ान जैसा पाक महीना और रोज़े जैसी बरकत दी है और उन्ही मेहरबानियों का नतीजा ईद है।

इस्लामिक त्योहारों का मक़सद सिर्फ खुशी का इज़हार करना नही है बल्कि इसके पीछे कुछ ठोस वैज्ञानिक एवं सामाजिक कारण भी है। जिस समय इस्लाम का प्रदुर्भाव हुआ, पूरा अरबिस्तान सामाजिक बुराइयों एवं आर्थिक विषमता के मकड़जाल में जकड़ा हुआ था। इस्लाम के सामने ये एक यक्ष प्रश्न था जिसका हल ख़ुदा के रसूल को ढूंढना था। रसूल-ए-अकरम  ने जिन त्योहारों के ज़रिए इस विषमता को दूर कर एक समरस समाज बनाने की कोशिश उसमे ईद-उल-फितर की ख़ास एहमियत है। ज़कात एवं सदक़-ए-फितर की व्यवस्था सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विपन्नता को ध्यान में रख कर ही की गई है।

चूंकि इस्लाम मे संपत्ति संग्रह को वर्जित किया गया है और अल्लाह के नेक बन्दों से ये अपेक्षा की गई है  कि वे ज़रूरत से अधिक धन एकत्रित न करें इसलिए एक तरीक़ा ऐसा निकाला गया जिससे धन का वितरण ज़रूरत मंदों के बीच होता रहे। ज़कात इस प्रक्रिया को पूरा करता है। रमज़ान में ज़कात देने का जो मक़सद है वह साफ -साफ इस बात की ओर इशारा करता है कि ईद का चांद निकलने से पहले हर व्यक्ति अपनी जरूरत की चीजें हासिल कर ले जिससे वह ईद की ख़ुशी का लुत्फ़ उठा सकें।

रसूल-ए-पाक ने अनेक बार इस बात को दोहराया है कि यदि समाज का एक तबक़ा अपनी जायज़ ज़रूरतों को पूरा नही कर पाता है तो आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों की यह  जिम्मदारी है कि वे उसे ख़ुशहाल ज़िन्दगी बसर करने में मदद करे। ये ही अल्लाह के नेक बंदों का काम है। इस तरह ईद अमीर-ग़रीब के बीच की खाई को पाटने में पुल  का काम करती है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने भी कहा है के अल्लाह के नज़दीक वह व्यक्ति होगा जो टूटे दिलों पर मरहम लगयेगा और उन्हें खुशी देगा।

ज़रूरतमंद लोगों की ईद को ख़ुशगवार बनाने के लिए मुसलमानों को सदक़-ए-फितर देने का हुक़्म दिया गया है। ये उन्ही लोगों को दिया जा सकता है जो ज़कात के हकदार हैं यनि ग़रीब, मज़लूम और मिस्कीन। ईद की नमाज़ पढ़ने से पहले अनाज या पैसे की शक़्ल में इसे निकाल दिया जाए। हज़रत मोहम्मद साहब ने सदक़-ए-फितर के बारे में कहा था कि ग़रीबों और मोहताजों को इतना दे दो कि ईद के दिन उन्हें किसी चीज़ का अभाव महसूस न हो और वे निश्चिंत होकर ख़ुदा का शुक्रिया अदा कर सकें। इस तरह ईद के बहाने हर साल आर्थिक विषमता को दूर करने का एक प्रयास किया जाता है। इस्लाम का अर्थ ही शांति होता है लेकिन तब तक शान्ति नही हो सकती जब तक कि आर्थिक विषमता की खाई पट न जाये। ज़कात एवं सदक़ा ऐसी इस्लामी व्यवस्था है जिसका ईमानदारी से निर्वहन कर हम न केवल आर्थिक विषमता को दूर कर सकते हैं बल्कि ईद की वास्तविक ख़ुशी भी प्राप्त कर सकते हैं जो इस त्योहार का मूल उद्देश्य है। ख़ुदाई फरमान को आये सदियां हो गईं परंतु अभी तक विषमता की खाई बरक़रार है। हमें आत्मचिंतन करना होगा कि ग़रीबों एवं मज़लूमों का ये हक़ उन्हें मिल रहा है कि नहीं इसके लिए सार्थक पहल की ज़रूरत है।

ईद की नमाज़ के लिए प्रत्येक व्यक्ति नये-नये कपड़े पहनता है, इत्र लगाता है और घर मे मुंह मीठा कर ईदगाह में नमाज़ अदा करता है। नमाज़ के बाद लोग एक-दूसरे के गले लगकर मुबारकबाद देते हैं। देखने मे ये एक साधारण सा कार्य लगता है लेकिन इसके पीछे जो मक़सद छिपा हुआ है वह सामाजिक समानता और न्याय का महत्वपूर्ण पहलू है। अमीर एवं ग़रीब बिना भेदभाव के एक दूसरे को ख़ुशी-ख़ुशी गले लगाते हैं और हाथ मिलाते हैं जो अन्य ख़ास मौक़ों पर नामुमकिन होता है।

ईद नामुमकिन को मुमकिन बना देती है। अर्थात ईद ऊंच-नीच, अमीर-ग़रीब एवं छोटे-बड़े का फ़र्क़ खत्म कर देती है। ईद के ज़रिए इंसान के दिलों में एक ऐसा एहसास  उभरता है कि सभी इंसान बराबर हैं और वास्तव मे ये ही फरमान-ए-इलाही भी है। ईद का दिन इंसानियत और मोहब्बत का होता है। ईद का एक दुसरा पहलू ये भी है कि इस दिन आपसी तनाव , रंजिश व दुश्मनी एक-दूसरे को गले लगा कर भुला दिया जाता है। कहने का तात्पर्य ये है कि ईद के दिन से पिछली ज़िन्दगी के ग़म-ओ-ग़ुस्सा को भूलकर नई ख़ुशनुमा ज़िन्दगी का आग़ाज़ होता है। इस तरह ईद आर्थिक विषमता को दूर करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि सामाजिक समानता एवं सौहार्द का प्रतीक भी है।

बनारस की ईद

हिंदुस्तान में मुसलमानों के आने के साथ ही ईद मनाने के द्रष्टान्त मिलने लगते हैं। बनारस में मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व ही मुस्लिम बस्तियां बस गयी थीं और गोविंदपूरा एवं हुसैनपुरा में ईद की नमाज़ पढ़ने की जानकारी मिलती है। जयचन्द की पराजय के बाद बनारस के मुसलमानों की ईद को देखकर कुतुबुद्दीन को आश्चर्य हुआ कि ईद की नमाज़ के बाद जो सौहार्दपूर्ण वातावरण यहाँ पर बना हुआ है उसमें हिन्दू-मुसलमान की अलग-अलग पहचान करना मुश्किल है। ये बनारसी तहज़ीब थी जो मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व बनारस में मौजूद थी। जिसने एक नई संस्कृति हिंदुस्तानी तहज़ीब को जन्म दिया। तब से लेकर आज तक ईद का त्योहार पारम्परिक ढंग से मनाया जाता है।

अनेक बार दहशत पसन्द ताक़तों द्वारा इसमें रोड़ा अटकाने की नाकाम कोशिश की गयी लेकिन बनारस के हर धर्म-बिरादरी के लोगों द्वारा इसमें शिरकत एवं ख़ुशी का इज़हार करना आम बात है। ईद बनारस के लोगों के बीच गंगा-जमुनी तहजीब का आईना है। इधर ईद समारोहों का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है जो स्वस्थ परंपरा का प्रतीक है। इस समारोह में प्रत्येक धर्म एवं विश्वास के लोग  सांप्रदायिक तनाव से मुक्त होकर एक-दूसरे से गले मिलते है तथा ईद के वास्तविक मक़सद को जानने -समझने की कोशिश करते हैं।

लेखक डॉ मोहम्मद आरिफ़ एक जाने-माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं

हमारी निष्पक्ष पत्रकारिता को कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त रखने के लिए आप आर्थिक सहयोग यदि करना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें


Welcome to the emerging digital Banaras First : Omni Chanel-E Commerce Sale पापा हैं तो होइए जायेगा..

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *