कानपुर अपराधी पुलिस मुठभेड़ – क्या फेल हुई एलआईयु, सवाल जो है अनसुलझे ?

तारिक आज़मी

कानपुर के बिकरु गांव में पुलिस विकास दुबे को पकड़ने गई थी। विकास दुबे का लम्बा चौड़ा अपराधिक इतिहास रहा है। इसके नाम से दर्ज 60 मामलो में अधिकतर हत्या अथवा हत्या के प्रयास के मामले है। 2001 में विकास दुबे ने तत्कालीन दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री को थाने के अन्दर घुस कर गोली मार हत्या कर दिया था। इस मामले में इसके जेल जाने के बाद चली लम्बी कानूनी लड़ाई में आखिर गवाह टूटे, सबूत गलत साबित हुवे और इसका रसूख देखे कि बाइज्ज़त बरी हो जाता है।

उस समय भी पुलिस ने इस मामले की विवेचना अथवा आत्ममंथन नही किया था कि आखिर कैसे ये बाइज्ज़त बरी हुआ। कौन गवाह टुटा, किस गवाह ने अपनी गवाही बदली। मामला ठन्डे बसते में चला गया और विकास दुबे के दबंगई का विकास दिन दूना रात चौगुना जारी रहा। पुलिस इसके ऊपर कार्यवाही करती रही। मामले आते रहे और जाते रहे। मगर विकास के अपराधिक इतिहास का विकास रोज़ ब रोज़ हो रहा था।

कल देर रात एक हत्या के प्रकरण में विकास दुबे को गिरफ्तार करने के लिए एक टीम बिकरू गाव जाती है। टीम का नेतृत्व खुद क्षेत्राधिकारी कर रहे थे। पुलिस टीम पुरे विश्वास से जाती है कि उसको विकास दुबे को पकड़ना है। मगर गाव के रास्ते में ही जेसीबी मशीन से रास्ता ब्लाक किया गया था। पुलिस टीम तीन तरफ से घिर जाती है। अँधेरे में जंगली सुअरो की तरह पुलिस पर ये दुर्दान्त हमला कर देते है। एक दो नही बल्कि कुल 8 पुलिस कर्मी शहीद हो जाते है। सूत्रों के मुताबिक कुछ घायल भी होते है। इसके बाद सभी अपराधी मौके से अँधेरे का फायदा उठा कर भाग जाते है।

इतनी बड़ी घटना होती है। पूरी तरीके से प्लांड वे में अपराधी काम करते है और भाग जाते है। इस पर सवाल तो बनता है। आम इंसान के दिमाग में भी सवाल उठ सकता है। जिसका जवाब अभी तक तो विभाग तलाश नहीं कर पाया है। मगर इसके जवाब को विभाग द्वारा तलाश करना ज़रूरी है। आखिर पुलिस कर्मियों के शहादत की बात है।

आखिर कैसे मिली अपराधियों को छापेमारी की जानकारी

जिस तरीके से अपराधियों के द्वारा घटना को अंजाम दिया गया उसको देख कर तो लगता है कि होने वाली पुलिस कार्यवाही की जानकारी पहले से ही अपराधियों को थी। तभी तो रास्ते में जेसीबी लगा कर रास्ता जाम कर दिया गया। उसके बाद अपराधी घात लगाये बैठे थे। ऐसा लगता है कि पुलिस की इतनी भारी भरकम टीम गांव आ रही है इस बात की जानकारी विकास दुबे और उसके कथित गैंग के लोगों को पता चल थी। उसके लोगों ने पूरी प्लानिंग के साथ गांव में घुसने वाले रास्ते में जीसीबी खड़ा कर रास्ता रोक दिया। इतना ही नहीं गांव के अंदर घरों की छतों पर उसके लोग घात लगाकर बैठे हुए थे। जैसे ही गांव में पुलिस की टीम घुसी पुलिस टीम पर तीन ओर से हमला कर दिया। छतों पर बैठे बदमाशों के लिए पुलिस पर निशाना लगाना आसान था और पुलिस की टीम को इस तीन तरफा हमले से संभलने का मौका नहीं मिला। इस गोलीबारी के बाद विकास दुबे और उसके गुर्गे अंधेरे का फायदा उठाकर फरार भी हो जाते है।

क्या एलआईयु के सूत्र फेल हो चुके है

सवाल इस बात का है कि जब बदमाशों ने इतनी बड़ी तैयारी कर रखी थी और वे पुलिस पर हमला करने की तैयारी में थे तो इस बात की भनक स्थानीय खुफिया (LIU) को क्यों नहीं लगी। क्योंकि गांव के रास्ते को जेसीबी लगाकर रोकने की प्लानिंग से ही अंदाजा हो जाता है कि वह घात लगाकर हमला करने की तैयारी कर चुके थे। आखिर एलआईयु को इसकी जानकारी कैसे नही लग पाई। क्या एलआईयु के सभी सूत्र फेल हो चुके है अथवा एलआईयु सिर्फ और सिर्फ पासपोर्ट वेरिफिकेशन से लेकर धरना प्रदर्शन तक ही अपने सूत्रों को एक्टिव रखती है।

ऐसा नही है कि एलआईयु पहली बार फेल हुई है। इसके पहले भी कई ऐसी छोटी बड़ी घटनाये प्रदेश में हुई है जिसमे एलआईयु का इनपुट ही जीरो रहा है। अगर एलआईयू हमेशा के तरह पैनी नज़र रखे तो शायद घटनाये होने के पहले ही रोकी जा सके। मगर गौर से देखा जाए तो अक्सर घटनाओं के सम्बन्ध में एलआईयु का इनपुट नही रहता है और घटनाओ के बाद एलआईयु अपने नेटवर्क को खंगालना शुरू करती है।

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