वीरान मस्जिदों और आहिश्ता लफ्ज़ “बिस्मिल्लाह अल्लाह-हु-अकबर” के बीच मुल्क में मनाई गई ईद-उल-अदहा (बकरीद), जाने मानव सेवा के इस त्यौहार के सम्बन्ध में

तारिक़ आज़मी

आज ईद उल अदहा का त्यौहार पुरे देश में मनाया जा रहा है। इस कोरोना काल में वीरान मस्जिदों के बीच इस त्यौहार की खुशियाँ अमूमन दिखाई नहीं दी है। वैसे तो आज के दिन पुरे देश में हर्षोल्लास के साथ इस त्योहार को मनाया जाता है। मगर कोरोना महामारी के बीच आज पुरे देश में शांति और भाईचारे के साथ इस ईद को लोगो ने घरो में ही मनाया,

जानकारी हेतु बताते चले कि ईद-उल-अदहा यानि बकरीद का त्यौहार हिजरी के आखिरी महीने ज़ु-अल-हज्जा में मनाया जाता है। पूरी दुनिया के मुसलमान इस महीने में मक्का सऊदी अरब में एकत्रित होकर हज मनाते है। ईद उल अजहा भी इसी दिन मनाई जाती है। वास्तव में यह हज की एक अंशीय अदायगी है और मुसलमानों के भाव का दिन है। दुनिया भर के मुसलमानों का एक समूह मक्का में हज करता है बाकी मुसलमानों के अंतरराष्ट्रीय भाव का दिन बन जाता है। ईद उल अजहा का अक्षरश: अर्थ त्याग वाली ईद है इस दिन जानवर की कुर्बानी देना एक प्रकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी है। इस कुर्बानी को प्रतीकात्मक सिर्फ इस लिए कहा जाता है कि आप किसी भी जानवर को पालते है तो उसके साथ आपका प्रेम और स्नेह बढ़ जाता है। एक साल कम से कम का जानवर और उसको अल्लाह के राह में कुर्बान कर देना एक त्याग की पराकाष्ठ ही कही जायेगी।

हज और उसके साथ जुड़ी हुई पद्धति हजरत इब्राहीम और उनके परिवार द्वारा किए गए कार्यों को प्रतीकात्मक तौर पर दोहराने का नाम है। हजरत इब्राहीम के परिवार में उनकी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल थे। इस्लाम मज़हब के अनुसार मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था, जिसमें अल्लाह ने उनसे अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ को उसके राह में कुर्बान करने का हुक्म दिया था। हुक्म-ए-इलाही थी तो हजरत इब्राहीम को उनके सबसे अज़ीज़ में उनके खुद के बेटे हज़रत इस्माईल थे। वह अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दे रहे थे हजरत इब्राहीम अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने निकल पड़े। पुस्तकों में आता है कि ईश्वर ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह दुम्बा (बकरे की नस्ल का एक जानवर) की कुर्बानी कबूल फरमाई।

दरअसल हज़रत इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वह थी कि खुद को भूल जाओ, मतलब अपने सुख-आराम को भूलकर खुद को मानवता/इंसानियत की सेवा में पूरी तरह से लगा दो। तब उन्होनें अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णल लिया। लेकिन मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था। उन्हें मक्का में बसाकर वे खुद मानव सेवा के लिए निकल गये।

इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी। जब हज़रत इस्माइल बड़े हुए तो उधर से एक काफिला (कारवां) गुजरा और इस्माइल का विवाह उस काफिले (कारवां) में से एक युवती से करा दिया गया। फिर प्ररांम्भ हुआ एक वंश जिसे इतिहास में इश्माइलिट्स, या वनु इस्माइल के नाम से जाना गया। आका सरवर-ए-कायनात हजरत मुहम्मद साहब का भी सम्बन्ध इसी वंश से है।

ईद उल अजहा के दो संदेश है पहला परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए ईद उल अजहा यह याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार में एक नया अध्याय लिखा गया। वही मानव सेवा भी इस त्यौहार का एक बड़ा उद्देश्य है। कुर्बानी के लिए जानवरों की खरीद से पशुपालको का परिवार पुरे एक साल खुद की ज़रुरियात पूरी करता है। वही दूसरी तरफ कुर्बानी के गोश्त में भी तीन हिस्से होते है। यानी तीन बराबर के हिस्सों में एक हिस्सा घर के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदार और पड़ोसियों के लिए और तीसरा हिस्सा सिर्फ और सिर्फ गरीब और मजबूर लोगो के लिए होता है।

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