तारिक़ आज़मी की मोरबतियाँ – खेत की जगह सडको पर किसान, आखिर कौन है ज़िम्मेदार ?

तारिक़ आज़मी

एक तरफ सरकार अपनी बात पर अडिग है कि वह तीनो कृषि बिल वापस नही लेगी। तो वही किसान सडको पर है। जमकर दिल्ली बोर्डेर पर प्रदर्शन चल रहे है। इस दरमियान गोदी मीडिया अपनी ढपली अपना राग अलाप रही है। सब अपना अपना कहते जा रहे है। किसान आखिर क्यों खेतो को छोड़ कर सडको पर है इसका फैसला करने के बजाये उनके रसोई में झाकने की कोशिश हो रही है। उनकी महँगी गाडिया दिखाई जा रही है। सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर ये इतने अमीर किसान कैसे है। क्यों भाई ? क्या अमीरी का अधिकार केवल कुछ लोग तक ही सीमित रखना चाहते है ? क्या किसी के पास महँगी गाडी उसकी विलासता का ही उदहारण है या फिर उसकी मेहनत को भी दर्शाती है।

इसके बाद भी बाते ख़त्म नही होती है। कुछ पतलकालो ने तो इस आन्दोलन को खालिस्तान से जोड़ना शुरू कर दिया। आपके हाथो में वैसे भी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी थमाई जा चुकी है। पढ़े लिखे होने का दावा करने वाले लोग व्हाट्स यूनिवर्सिटी से ओतप्रोत ज्ञान परोस रहे है। कल तक जो खुद के ऊपर पड़ने पर कोरोना काल का रोना रो रहे थे। आज शूरवीर बनकर किसान आन्दोलन को भाड़े के मजदूर का आन्दोलन बता रहे है। बड़ी बड़ी पोस्ट चला रहे है कि भाड़े के मजदूरों का बल लेकर ही किसान सडको पर है। कमाल करते है लोग। कल जब उनके ऊपर पड़ी थी तो उनको भाड़े के मजदूर भी नही मुहैया हो रहे थे। होता है कभी कभी इंसान का दिमागी तवज्ज़ुन काम करना बंद कर देता है।

लोकतंत्र है साहब, कोई कुछ भी कह सकता है। हमारा काम किसी की जबान रोकना थोड़ी है। देश के एक बड़े बुद्धिजीवी ने लोकतंत्र के ऊपर ही सवाल खड़ा कर डाला। एक वेब न्यूज़ को अपनी राय देते हुवे सज्जन ने कहा कि “भारत में ज़्यादा ही लोकतंत्र है इसलिए सुधार नहीं हो पाते।” कुछ लोग उनके इस बयान पर आश्चर्य चकित रह गए तो काफी ऐसे भी थे जो इसका मतलब भी नही समझ पाए और सिर्फ इस लिए वाह कह बैठे है क्योकि उनको लगता है कि ये बयान उनकी पसंदीदा सियासी पार्टी के समर्थन में है। भाई समझे, आर्थिक सुधार से बड़ा लोकतंत्र है। ये लोकतंत्र की ही देंन है कि उसके ऊपर सवलिया निशाँन लगाए जा रहे है। तानाशाही से ज़्यादा खतरनाक वो मानसिकता होती है जो लोकतंत्र के विरोध में बनाई जाती है। लड़ाई इंसान को भेड़ बना सकती है। और ऐसी कोशिशे पहले भी हुई है। किसी दल को ये अधिकार मत दीजिए कि वो लोकतंत्र को चोट पहुंचा सके। सरकार बनाने के बाद उससे सवाल पूछते रहिए। पूछने वालों का विरोध करके आप अपने अधिकारों की लूट का साथ देते हैं।

एक मंत्री जी ने तो लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा पूरा प्रयोग किया।  केंद्रीय मंत्री रावसाहेब दानवे ने कहा कि इस किसान आन्दोलन में चीन और पकिस्तान का हाथ है। खालिस्तान का मुद्दा फेल होने के बाद चीन और पाकिस्तान का नाम आना कोई अचम्भित करने वाला बयान नही था। मुद्दे पर आप बहस करेगे तो पाकिस्तान और चीन दोनों का नाम आएगा ही। आखिर क्यों नही आये। सबको पता है कि चीन और पाकिस्तान से आपको नफरत हो गई है। इस नफरत में थोडा सा घी डालना आग खुद ब खुद भड़का देगी। किसान सड़क पर है तो चीन और पाकिस्तान का नाम सामने लेकर आये। काम बन सकता है। जनता का दिमाग भटकाने का इससे बड़ा मौका क्या हो सकता है।

वैस भी न्यूज़ चैनलों पर अजीबो गरीब बहस आपको भीड़ में तब्दील करने की कोशिश में कामयाब हो चुकी है। बाकि बचा कूचा जो कुछ था वो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान ने पूरा कर डाला है। आप खुद इसी भीड़ का हिस्सा बनना सही समझा होगा। तभी आज किसान खुद खेतो के बजाये सडको पर है। सड़क पर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है। कई दौर वार्ता के बाद भी निष्कर्ष अभी तक शुन्य है। खुद का खाना खाकर मीटिंग में बैठ कर आप अपने अधिकारों की बात करते है तो बेहतर महसूस हो जाता है। मगर इसके ऊपर भी आपको तंज़ देखने को मिलेगा कि क्या खाना किसी व्यक्ति विशेष का था। शायद बरनाल कंपनी के स्टॉक आज कल कम पड़ चुके है।

आप किसान हो, हकीकत में आप हमेशा भोले रहे है। देश के लिए अन्ना देने वाले अन्नदाता देश की रक्षा के लिए अपना बेटा भी देता है। आप गौर करे तो किसान अनाज से लेकर जान तक देश के लिए देता है। जय जवान, जय किसान का नारा देकर देश को प्रगति के पथ पर किसान लेकर आया। इतिहास उठा कर देख ले आप। किसान खुद अपनी जान दे चूका है मगर सड़क पर आज तक कभी नही आया। बड़े आन्दोलन को किसानो ने समर्थन ही दिया और आधी अधूरी क्रांति के इस युग में क्रांतियो को लिखा भी। मगर आज वो समय है जब किसान खुद आज सडको पर है।

लेखक – तारिक आज़मी – प्रधान सम्पादक (PNN24 न्यूज़)

आखिर इसका ज़िम्मेदार कौन है ? इसका ज़िम्मेदार खुद किसान है। आप हमेशा से भोले रहे है। आज भी आपका भोलापन आपको सडको पर लाने के लिए ज़िम्मेदार हुआ। इतिहास गवाह है आपने एक दल को वोट देकर सत्ता के शीर्ष पर बैठाला तो दुसरे दल को आपने समर्थन देकर बगल में बैठाला। बगल में बैठा हुआ सत्ता का विपक्ष हुआ और विपक्ष हमेशा अपनी भूमिका निभाता है। वर्त्तमान सत्ताधीश भी जब विपक्ष में थे और आपने बगल में बैठाला था तब भी यही स्थिति थी। विपक्ष अपनी मजबूत भूमिका निभा रहा था। मगर आज क्या हुआ। वर्ष 2014 में आपने नया तरीका अपनाया। एक पक्ष को आपने सत्ता के शीर्ष पर बैठाला और दुसरे पक्ष को आपने फटकार कर अपने से दूर कर दिया।

नतीजा आपके सामने है आप आज खुद सडको पर है। आन्दोलन कर रहे है। आपकी मांग है एक कानून को वापस करने की और सरकार आपको दो टुक में बोल चुकी है कि कानून वापस नही होगा। बल्कि उसमे आपके कहने पर थोडा फेरबदल हो जायेगा। फेरबदल भी थोडा थोडा ही होगा। आप उस अमेंडमेंट को नकार चुके है। अब आपके पास इस आधी अधूरी क्रांति के इस दौर में क्रांति करने का ही रास्ता बचा हुआ है। हम तो २०१६ से कहते आये है कि आप टीवी मनोरंजन के लिए लिए है तो आप मनोरंजन करे। टीवी देखना बंद कर दे। आज आप देखे आपके ही मुद्दों को किस प्रकार परोसा जा रहा है। कितने है जो आपकी जमीनी हकीकत दिखा रहे है। आपका पसंदीदा अखबार आपको दुसरे तीसरे पायदान की अहमियत दे रहा है। व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी पर आपके विरोध में ही ज्ञान परोसा जा रहा है। हम जय जवान, जय किसान आज भी कह रहे है। हमेशा कहते रहेगे.

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