बड़ा खुलासा – बचिए, इस गैंग से…! वर्ना झूठें रेप या पाक्सो में पिसेंगे जेल में चक्की – भाग – 1

तारिक आज़मी

वाराणसी। आपको 16 दिसम्बर 2012 तो याद होगा। ये वही काला दिन है जिस रात दिल्ली की सडको पर देश की बेटी निर्भय के साथ दरिंदगी की सभी हदे पार हो गई थी। उसका गैंग रेप कर सड़क पर मरने के लिए छोड़ कर ज़ालिम चले गए थे। इस घटना ने देश को अन्दर तक झकझोर दिया। देश में ऐसी घटनाओं के खिलाफ उबाल आ गया। शायद ही कोई ऐसा शहर होगा जिसके प्रमुख चौराहों पर इस घटना के खिलाफ प्रदर्शन न हुवे हो। सभी इस प्रकार की घटना की कड़ी भर्तसना कर रहे थे। इस दरमियान सख्त कानून ऐसी घटनाओं के खिलाफ बनाने की मांग उठी।

मांग उठने लगी कि कानून ऐसा सख्त हो कि दोषियों को जल्द से जल्द सजा मिले। रेप के आरोपियों का दोष सिद्ध होने पर उन्हें सजा-ए-मौत भी मिले। देश बदलाव चाहता था। देश बेटियों की सुरक्षा चाहता था। आखिर सरकार के कानो तक भी ये आवाज़े पहुची और काफी जोर से पहुची। तत्कालीन सरकार ने भी इस घटना के बाद यानी निर्भया कांड के बाद तीन फरवरी 2013 को क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस पास किया, जिसके तहत आईपीसी की धारा 181 और 182 में बदलाव किए गए। इसमें बलात्‍कार से जुड़े नियमों को कड़ा किया गया। रेप करने वाले को फांसी की सजा भी मिल सके, ऐसा प्रावधान किया गया। 22 दिसंबर 2015 में राज्यसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल भी पास हुआ।

निर्भया कांड के बाद बलात्कार से जुड़ी कानून की कई धाराओं में बदलाव हुए। कई राज्यों ने ऐसे मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की जरूरत महसूस की और इसे लागू किया। निर्भया कांड से पहले सेक्सुएल पेनिट्रेशन को ही रेप माना जाता था। लेकिन इस कांड के बाद देश में रेप की परिभाषा बदल गई। गलत तरीके से छेड़छाड़ और अन्य तरीके के यौन शोषण को भी रेप की धाराओं में शामिल किया गया। पॉक्सो अंग्रेजी शब्दों का संक्षेपन रूप है, जिसका फुल फॉर्म है- प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल ऑफेंसेस। इसी को लेकर साल 2012 में ही पॉक्सो एक्ट 2012 यानी लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012 बनाया गया।

इन सबके साथ अब देश के हर एक शहर अथवा गाव में रेप जैसे जघन्य अपराध के लिए तत्काल सुनवाई होती है। महिलाओं के उत्पीडन के खिलाफ तत्काल सुनवाई होना और तत्काल केस रजिस्टर्ड कर कार्यवाही होना निर्देशित हुआ और इसका कड़ाई से पालन किया जा रहा है। महिलाओं के प्रति बढती हिंसा और अन्य अपराध से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने “मिशन शक्ति” जैसा क्रांतिकारी अभियान चलाया। हर एक शहर, गाव में इस कार्यक्रम का प्रचार प्रसार जारी है। अपने अधिकारों के लिए महिलाओं को सचेत भी किया जाता है।

इन सबके बीच जहा पीड़ित महिलाओं को जल्द से जल्द न्याय मिल जाता है वही महिला सुरक्षा भी पुख्ता हो रही है। मगर कहा जाता है कि कानून के उपयोग के साथ उसका दुरूपयोग भी होने लगता है। तो ऐसे भी लोग इस समाज में है जो कानून का दुरूपयोग भी करते रहते है। इस दुरूपयोग करने वालो के लिए किसी से दुश्मनी निकालने का सबसे आसन रास्ता बनता जा रहा है। अब दिल्ली के इसी केस का मामला ले ले। इस मामले का आरोपी और शिकायतकर्ता परिवार बाहरी दिल्ली में एक ही मकान में किराए पर रहते थे। वर्ष 2016 में इनका ई-रिक्शा को लेकर आपस में झगड़ा हुआ था। तब शिकायतकर्ता ने अपनी पांच साल की बेटी के साथ अप्राकृतिक यौन शोषण का आरोप युवक पर लगा दिया था। इस आरोप में पुलिस ने युवक को तत्काल गिरफ्तार कर लिया था। सत्र अदालत ने आरोपी को वर्ष 2018 में दस साल की जेल की सजा सुनाई थी।

सजा सुनाये जाने के बाद जेल में बंद आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल किया। उसने इस अपील में कहा कि वह आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। इसी कारण सत्र अदालत में अपने बचाव के लिए वकील पेश नहीं कर पाया। उच्च न्यायालय ने बचाव के लिए वकील की उपस्थिति न होने को दोबारा सुनवाई का आधार माना। उच्च न्यायालय ने आरोपी के बचाव के लिए न्यायमित्र की नियुक्ति के आदेश दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण को दिए थे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामला रोहिणी स्थिति अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय पांडे की अदालत में भेज दिया था। गिरफ्तारी के बाद से ही आरोपी युवक न्यायिक हिरासत में था। मुकदमे की दोबारा सुनवाई को चार महीने में ही पूरा कर लिया गया। सुनवाई के बाद अदालत ने बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर आरोपी युवक को बरी कर दिया।

आरोपी के बचाव के लिए पेश हुई अधिवक्ता न्यायमित्र सुरभि धर ने निजी तौर पर घटनास्थल का मुआयना किया और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर पुख्ता तरीके से अदालत में पक्ष रखा। इन्हीं के बल पर अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया।  असल में इस मामले में बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट में उसके साथ यौन शोषण जैसे अपराध की पुष्टि नहीं हुई थी।
घटना के दिन और समय पर आरोपी युवक की घटनास्थल  पर मौजूदगी ही नहीं थी। बच्ची के बाल व कंबल के आधार पर आरोपी को सजा हुई थी। न्यायमित्र की जांच में ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे पता चला कि बाल,  कंबल शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोपी के कमरे में प्रायोजित (रख दिए थे) किए थे।  इस प्रकरण में अदालत ने वकील साहिब की भी काफी प्रशंसा किया था। मगर इन हिकारत और नफरत के तीन साल लगभग वो युवक जेल में था। इन तीन सालो में उसकी हस्ती खेलती ज़िन्दगी तबाही के कगार पर पहुच गई थी।

अब आप चेन्नई का ही केस ले ले। कॉलेज के छात्र रहे संतोष को पुलिस ने बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। युवक के खिलाफ 7 साल तक मुकदमा चला। हालांकि, बाद में डीएनए टेस्ट की वजह से पता चला कि जिस बच्चे को महिला ने जन्म दिया है, वह संतोष का नहीं है। दरअसल, युवक और महिला का परिवार पड़ोसी थे और एक ही समुदाय से संबंध रखते हैं। पहले यह तय हुआ था कि दोनों की शादी करा दी जाएगी, लेकिन बाद में संपत्ति से जुड़े किसी विवाद की वजह से दोनों परिवार अलग हो गए। जिसके बाद संतोष का परिवार चेन्नई में दूसरी जगह शिफ्ट हो गया था। इस दौरान संतोष ने बीटेक में दाखिला ले लिया था।

आरोप लगाने वाली महिला की मां ने युवक के घर पहुंच कर कहा कि उसने युवती को गर्भवती कर दिया है और परिवारों को जल्द से जल्द शादी तय करने की मांग की। हालांकि, संतोष ने इस तरह के किसी भी संबंध से इंकार किया। इसके बाद महिला और उसके परिवार ने युवक के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करा लिया। बाद में संतोष को गिरफ्तार कर लिया गया और 95 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। युवक को 12 फरवरी 2010 को जमानत मिली और इस दौरान महिला ने एक बच्ची को जन्म दे दिया। डीएनए टेस्ट से पता चला कि संतोष उस बच्ची का पिता नहीं है।

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के ललितपुर निवासी विष्णु का ताज़ा प्रकरण देख ले। विष्णु 20 साल से उस घिनौने अपराध की सजा काट रहा था जो उसने किया ही नहीं, लेकिन जब तक विष्णु की बेगुनाही साबित होती तब तक वो अपना सब कुछ लुटा चुका था। एक-एक कर उसके मां-बाप चल बसे। दो बड़े शादीशुदा भाई भी यह दुनिया छोड़ गए। इसके बाद जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने विष्णु को रिहा करने का आदेश जारी किया तो एक सवाल जरूर उठ खड़ा हुआ कि इससे पहले इस केस में क्या हो रहा था ? विष्णु बेहद गरीब परिवार से था।

इस केस को लड़ने के लिए उसके परिवार के पास न तो पैसे थे और ना ही कोई अच्छा वकील। लेकिन सेंट्रल जेल आगरा आने के बाद यहां उसे जेल प्रशासन की मदद से विधिक सेवा समिति का साथ मिला। समिति के वकील ने हाईकोर्ट में विष्णु की ओर से याचिका दाखिल की। सुनवाई चली और एक लम्बी बहस के बाद विष्णु को रिहा कर दिया गया। अब आप सोचे जब 20 साल बाद विष्णु जेल से बाहर निकला तो उसके पास जेल में काम करके मिले 600 के करीब रूपये थे। सब कुछ खत्म हो चूका था। 20 साल वो ऐसे गुनाह की सजा काटता रहा जो उसने किया ही नहीं था।

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