अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस – वाराणसी के आदमपुर थाने पर तैनात महिला पुलिस कर्मी आलम आरा, पर्दे से वर्दी तक का सफ़र

तारिक़ आज़मी

वाराणसी। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पुरे दुनिया में धूमधाम से मनाया गया। देश के हर एक शहर से लेकर गावो तक महिलाओं के सम्मान के लिए कार्यक्रम आयोजित हुवे। इस दरमियान मंचो से भाषण भी हुवे। महिलाओं को सम्मानित किया गया। महिलाओं की हर क्षेत्र में बढती भूमिका की भी चर्चाये हुई। इस दरमियान कई अन्य उदाहरण दिया गया। हम आज आपको बड़े नामो का उदाहरण नही देकर उन खबर पर आपकी तवज्जो चाहेगे जो वक्त के रफ़्तार की धुंध में कही गुम हो जाती है। आपको महिला सशक्तिकरण का एक उदाहरण देंगे जिसने ज़मीनी स्तर पर काफी मुश्किलातो का सामना किया और आज खुद की समाज में अपनी अलग पहचान बनाया।

ये नाम है आदमपुर थाने में पोस्टेड महिला हेड कांस्टेबल आलम आरा एक भाई और पांच बहनों में सबसे छोटी आलम आरा का जन्म एक निम्न माध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। परिवार में शिक्षा का तो महत्व था मगर महिला शिक्षा पर बहुत अधिक बल नही था। बचपन से ही खुद को वर्दी में देखने की तमन्ना लिए आलम आरा पर्दानशी परिवार में बड़ी होने लगी। पिता की चहेती आलम आरा की पढाई चल रही थी। वह जब हाई स्कूल में थी तभी उनके वालिद गुज़र गए। एक भाई वह भी नबीना और पिता का साया सर से उठ जाने के बाद आलम आरा का जीवन मुश्किलों से भर गया।

भरे पुरे कुनबे में दकियानुसी खयालातो का सामना सबसे अधिक आलम आरा को करना पड़ा। पैसो की तंगी ने जब उनकी शिक्षा पर असर डालना चाहा तो आलम आरा ने उसके लिए बच्चो को ट्यूशन पढाना शुरू किया और खुद की पढाई जारी रखा। समाज में लोगो की जुबांन कौन रोक सकता है। रिश्तेदार नातेदार कुनबे के लोग इसके सख्त मुखालिफ होते जा रहे थे कि परदे के पीछे से आलम आरा पुलिस की नौकरी करे। मगर आलम आरा ने जिद्द ठान रखा था कि वह अपने सपने को साकार करेगी। वक्त गुज़रता गया पढाई मुकम्मल कर आलम आरा ने कम्पटीशन की तैयारी शुरू कर दिया। वही रोक टोक के अलफ़ाज़ भी बढ़ने लगे।

वक्त ने करवट लिया और समस्त अडचनों को दरकिनार कर आलम आरा ने वर्ष 1998 में पुलिस की नौकरी पा लिया। वर्दी पहन कर जब वह पहली बार अपने रिहाईशी इलाके में पहुची तो अब महोल बदल चूका था। जो होठो से लोग आलोचना करते थे वही लब तारीफ करने लगे। आज लगभग 23 साल की बेदाग़ नौकरी पूरी कर चुकी आलम आरा के नाम पर उनके वह भी जानने वाले फक्र करते है जो कभी उनके परदे में न रहने के मुखालिफ थे। आज पूरा कुनबा उन पर नाज़ करता है। एक पुराने ख्यालातो और परदे की सोच वाले समाज से आगे आकर आलम आरा आज महिला सशक्तिकरण की एक जिंदा मिसाल बनी है। आज आदमपुर थाना परिसर में जब अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का कार्यक्रम आयोजित हुवा तो क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों और सभ्य नागरिको ने आलम आरा और उनके स्ट्रगल की भूरी भूरी प्रशंसा किया।

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