हाल-ए-नगर निगम वाराणसी : कैसे रुके महामारी, जब सियासत के कंधो पर होती है नगर निगम के सेनेटाइज़ेशन की तैयारी

तारिक आज़मी

वाराणसी। पूरा शासन प्रशासन इस जद्दोजेहद में लगा हुआ है कि कैसे कोरोना महामारी को फैलने से रोका जाए। मगर सियासत इस जुगाड़ में लगी है कि आखिर वोट कैसे बटोर जाए। उसको इससे मतलब नही कि कैसे किसका भला हो। हाँ मतलब इससे ज़रूर होता है कि आखिर जिला प्रशासन जो काम करवा रहा है उसमे अपना नाम कैसे कमाया जाए। जिले के नगर निगम के कर्मचारी भी इस खेल में सियासत का साथ देते है आखिर दे भी क्यों न ? सुपरवाईज़र की “दस्तूरी” भी तो है।

वाराणसी नगर निगम के द्वारा शहर में सेनेटाईजेशन और रात को फगिंग मशीन का उपयोग किया जा रहा है जिससे कोरोना महामारी को रोका जा सके। ये काम प्रशासन स्तर पर हर के मुहल्लों और गलियों में करवाने का निर्देश स्पष्ट रूप से दिया गया है। मगर शहर में देखा जा रहा है कि नगर निगम के इस काम में सियासत अपना नाम और टांग ज़रूर घुसेड रही है। सियासत इन मशीनों के आगे आगे या तो खुद या फिर सीना ताने अपने शागिर्दों को भेज देती है ताकि जनता को लगे कि अमुक नेता जी के नेतागिरी का नतीजा है ये काम हो रहा है।

भगवान के समान खुद को समझने वाले सियासतदाहो ने सरकारी काम को सच मानिए तो हाईजेक कर रखा है। इस हाईजेक में शहर के सुपरवाईज़र उनका भरपूर साथ देते है। उनका साथ देना कही न कही से उनकी मज़बूरी है। क्योकि उनको पता है कि “दस्तूरी” भी तो ज़रूरी है। अब ये दस्तूरी क्या होती है तो तनिक अपने क्षेत्र के किसी सफाई कर्मी से पूछ लीजियेगा कि “दस्तूरी” क्या होती है ? इसी “दस्तूरी” के खेल में ये सफाई सुपरवाईज़र सियासत के हाथो कठपुतली बने रहते है। वैसे सुना जाता है कि इस “दस्तूरी।” का तबर्रुक कई हिस्सों में तकसीम होता है। बहरहाल, हमको क्या करना है, दस्तूर है कि दस्तूरी पर ख़ामोशी अखितियार किये रहा जाए तो हम भी खामोश है। मगर ऐसा भी नही है कि दस्तूरी के दस्तूर से हम अनजान है अथवा हमारे पास इसके साक्ष्य नही है।

जो हालात हम बयान कर रहे है वो ऐसा नही कि किसी एक क्षेत्र में हो। बल्कि ये कमोबेस पुरे शहर में ही है। आगे आगे सियासत के परोकार सीना ताने चलते है, पीछे पीछे नगर निगम का कर्मचारी रहता है। सियासत ख़ास ख्याल रखती है कि कही किसी ऐसे इलाके में नगर निगम की सुविधा न पहुच जाए जहा से उसकी सियासत नही चलती है। इसी को ख्याल में रखकर तो सीना ताने सियासत के पैरोकार को आगे आगे भेजा जाता है। ताकि जनता समझ सके कि सियासत ने ये काम करवाया है। वरना किसी के अन्दर दम नही होता कि ये काम हो जाए।

कमाल करते है न ऐसे लोग ? आप सही सोच रहे है। सोचना भी चाहिए। मगर इसके असली ज़िम्मेदार आप हो। आप सियासत को भगवान बना बैठे हो। सुबह से लेकर शाम तक सियासत की जय कहते रहते हो। कभी आपने उस सियासत को देखा ही नही। आपको मालूम ही नहीं कि सियासत ही सियासत की पहचान है वरना कौन जानता इस सियासत को। दो प्लेट बिरयानी, और चंद सिक्को के कुवत पर चलती सियासत को तो आपने ही पाल पोस कर बड़ा कर डाला है। हकीकत जानिये “सियासत में ज़रूरी है रवादारी समझता है, वो रोज़ा तो नही रखता मगर इफ्तारी समझता है।”

वैसे जिला प्रशासन को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए। सियासत के चक्कर में कही उसके किये हुवे कामो और प्रयासों पर पानी न फिर रहा हो। बेशक मेहनत हर एक अधिकारी कर रहा है। मगर अधिकारी की मेहनत पर कही सियासत पानी न फेर दे। ध्यान तो इसका भी देना होगा कि कही नगर निगम के द्वारा उपलब्ध सेवाए किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति तो नहीं बनती जा रही है।

एक लीटर सेनेटाइज़र में इलाका पूरा करवाते है सुपरवाईज़र सेनेट्राइज़

 घटतौली का आलम कहेगे इसको या फिर भ्रष्टाचार। एक लीटर सेनेटाइज़र से सफाई सुपरवाईज़र साहब लोग पूरा का पूरा एक इलाका सेनेटराईज करवाने का दम्भ भरते है। पांच लीटर पानी में चंद बूंद इसकी डाल दिया जाता है और क्षेत्र की जनता के लिए सेवा उपलब्ध हो जाती है। बकिया बचा हुआ सेनेटाइज़र शायद सुपरवाईज़र साहबान के घरो में आराम तलब करता होगा। खुद सोचे सिर्फ पानी के बल पर लगभग ये काम किया जा रहा है। अधिकारी खामोश है। सियासत इसके ऊपर ध्यान कब देती है ? आप भी ध्यान नही देते है। तो फिर लगे रहे और कहते रहे “सियासत की जय”

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