तारिक़ आज़मी की मोरबतियाँ – तालाबंदी के खौफ से सिहरते ये परदेसी लौट रहे आशियाने को, कही और भी भयावाह न हो जाए स्थिति

तारिक़ आज़मी

चंद रोटी के लुक्मो की तलाश और जद्दोजेहद इनके कदमो को परदेस लेकर चली गई थी। इन चंद लुक्मो की भूख कुछ भी करवा देती है। सुबह कमाना शाम को कमाना बच्चो की परवरिश करना और खुद और परिवार का पेट भर कर सो जाना। दुसरे दिन फिर सुबह तडके उठकर वही पुरानी ज़िन्दगी में लौट जाना और रोटी की तलाश में दिन भर जी तोड़ मेहनत करना। भले कुछ सियासत के फेके हुवे पैजामो में अपनी टांग घुसेड कर सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने वाले कथित क्रन्तिकारी ये कहे कि परदेस में रहकर इतना भी न कमाया कि दो चार महीने बैठ कर खा सके। मगर उनके लफ्जों को ध्यान न देना इन परदेसी लोगो के लिए कोई बड़ी बात नही है।

ध्यान भी क्यों दे परदेसी, उसको तो वो रोटी की लुक्मो को कमाने की जद्दोजेहद है जो शाम होने पर उसका और उसके परिवार का पेट भर सकेगी। उन सिक्को की ज़रूरत है जो महिना पूरा होने पर उसके बच्चो के कापी किताब और स्कूल की फीस भर सकेगी। उन परदेसियो को पता है कि जो सोशल मीडिया पर उनके लिए ज्ञान बघार रहे है उनके मुह में घुला पान अथवा होटो से चिपकी सिगरेट अथवा बीडी भी उधार होगी और ये मेहनत उनके बस की न है। मगर ज्ञान है तो बघार देंगे। परदेसियो को तो अपने रोज़ के काम से मतलब है। कैसे काम पर जाना है। लोकल ट्रेन पकड़ कर भूसे की तरह ठूस कर जाना है और उसी तरह वापस आना है। मुंबई की ज़िन्दगी जैसी बन गई है ये लोकल ट्रेन। जिंदा रहने के लिए इसका इस्तेमाल तो करना ही है। इस लाइफ लाइन के सहारे ही तो इनकी भी ज़िन्दगी कटती है।

आखिर उनको याद आता है पिछले वर्ष की “तालाबंदी”। इस तालाबंदी में क्या हाल उनकी हुई थी। कोई साधन न मिलने के कारण पैदल और अन्य रास्तो का प्रयोग करके ये हजारो किलोमीटर तक का भी सफ़र तय करके वापस अपने घोसलों में लौटे थे। भूखे प्यासे और खुद की ज़िन्दगी को बचाते कैसे ये वापस लौटे थे अपने आशियाने को। ज़िन्दगी का ये सफ़र शायद ही ये परदेसी भूल सके। वैसे भूल तो पूरा मुल्क नही सकता है जब उनको पैदल सफ़र करते देख रहा था। मगर वक्त के साथ भूलना ही ज़रूरी है। ज़िन्दगी तो चलनी ही है।

एक बार फिर मुल्क में हालात वैश्विक महामारी कोरोना के चलते बिगड़ रहे है। काफी शहरों में नाईट कर्फ्यू का सहारा लेकर इसको नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है। सबसे बुरे हालात तो महाराष्ट्र में होते जा रहे है। यहाँ के हालात को देखकर इन परदेसियो के दिल में खौफ पैदा होने लगा है दुबारा तालाबंदी का। पिछली तालाबन्दी के दर्द को अभी ये परदेसी भूले ही कहा थे कि एक और बार खौफजदा कर रही है कोरोना से होती हालात। इन परदेसियो को अब तालाबंदी का डर दुबारा सताने लगा है। उनको खौफ है कि मुल्क में एक बार फिर कही हालात वैसे ही न हो जाए जैसे पिछले साल हुवे थे।

मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल के फोटो इस खौफ को बयान करने को काफी है। मुंबई से आपके शहर में आने वाली ट्रेनों की भीड़ भी इस खौफ को बयाँ कर रही है। आप गौर से देखे इन ट्रेनों की भीड़ को। सोशल डिस्टेंस और मास्क ज़रूरी के नारे ने इन ट्रेनों में धज्जियाँ अपनी उडवा रखा है। इन मुसाफिरों को बस एक ही डर है कि कही दुबारा तालाबंदी न हो जाए। कही हम फिर से परदेस में न फंस जाए। उनको न कोरोना से डर है और न किसी और बात का आप तस्वीरे देखे खुद समझ जायेगे। आप वीडियो देखे खुद समझ जायेगे कि इनको खौफ सिर्फ और सिर्फ एक बात का है कि कही तालाबंदी दुबारा न हो जाए। कही ऐसा न हो कि हम दुबारा परदेस में फंस जाए। कम से कम अपने आशियाने को पहुच जाये ताकि दो वक्त की रोटी किसी तरह चल जाए।

सोचिये आप, गरीबी का मज़ाक तो बनाया जा सकता है। मगर आज़ादी जब बुज़ुर्गी के तरफ बढ़ चुकी है तो फिर ऐसे हालात कैसे हो सकते है आप सिर्फ सोच सकते है। मगर हकीकत ये है कि सब आपके आँखों के सामने है। खुद देखे। इनके दर्द को महसूस करे। उस तकलीफ को महसूस करे जो परदेस में होने के बाद होता है। जब कोई अपने जिले का अजनबी भी मिलता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई अपने सगे वाला मिल गया हो। मगर साथ में उस दर्द का भी अहसास करे जो ये परदेसी अपने दिलो में समेटे है। आप सोचिये कि आखिर इस तरीके से बिना किसी टेस्ट के आपके शहर में आपकी बस्ती में लोग आ रहे है। क्या हालात होंगे खुद सोचे।

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