कई साँसे इसके पहले भी रुक चुकी है जेल के चारदीवारी में, अन्नू त्रिपाठी से लेकर बजरंगी तक हुवे है इसके शिकार, सबसे दर्दनाक मौत मारा गया था मोनू पहाड़ी

तारिक आज़मी

पूर्वांचल की जेलों में अपना वर्चस्व स्थापित करने की जंग में पगली घंटी बजती रही है। मारपीट, तोड़फोड़ और बंदी रक्षकों से लेकर जेलर तक पर अपना प्रभाव छोड़ने को लेकर कुख्यात कुछ भी कर गुजरते हैं। चित्रकूट जेल में गैंगवार कोई नई बात नही है। अभी एक साल भी नही गुज़रा है कि कानपुर के कुख्यात शूटर मोनू पहाड़ी जो दिनदहाड़े घटनाओं को अंजाम देने के लिए कुख्यात था की पीट पीट कर जेल में हत्या हो गई थी।

अमूमन जेल में अपने वर्चस्व को लेकर गुट आपस में भीड़ जाते है। पगली घंटी बजा कर जेल में अराजकता कोई नई बात नही है। वर्ष 2016 के अप्रैल माह में वाराणसी के जिला जेल में बंदियों ने मारपीट का आरोप लगाकर जेल को पांच से छह घंटे तक अपने कब्जे में रखा था। उस दौरान डिप्टी जेलर को बंधक बनाकर बंदियों ने पिटाई की थी। इसके बाद भी बंदियों के बीच आपस में टकराहट होती रही। 2018 में भी बंदियों ने वर्चस्व की जंग में जेल के माहौल को अशांत कर दिया था। सियासी रसूख वाले बंदियों को जेल के अंदर मादक पदार्थ, मोबाइल चलाने की छूट को लेकर भी माहौल तल्ख रहता है।

वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर और मिर्जापुर जेल में वर्चस्व की लड़ाई चलती है। पूर्वांचल के जेल में तो मादक पदार्थ की बिक्री का वीडियो भी वायरल हो चूका है। जेल के अंदर कैदियों की बात न मानने का भी अंजाम बुरा होता है। जेल के अंदर माफिया मुन्ना बजरंगी की शर्तों को न मानने पर वाराणसी जिला जेल के डिप्टी जेलर अनिल त्यागी की 23 नवंबर 2013 को पांडेयपुर क्षेत्र में जिम से बाहर निकलने के दौरान अंधाधुंध गोलियां बरसाकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना को अंजाम देने में मुन्ना बजरंगी के शार्प शूटर अमजद, वकील पांडेय, राजेश चौधरी और रिंकू सिंह का नाम सामने आया था। कुछ सफ़ेदपोश इस मामले में संरक्षण देने के आरोप में गिरफ्तार भी हुवे थे। इसके अलावा मुख्य शूटर अमजद व वकील पांडेय को प्रयागराज में एसटीएफ ने चार मार्च 2021 को मुठभेड़ में मार गिराया था।

अन्नू त्रिपाठी की वाराणसी सेन्ट्रल जेल में हुई हत्या भी काफी चर्चा का केंद्र रही। अन्नू के सामने काफी छोटे कद के अपराधी संतोष गुप्ता किट्टू पर लगा था। इसके एक वर्ष पहले मुन्ना बजरंगी के इशारे पर अन्नू त्रिपाठी और बाबु यादव ने अपने साथियों सहित सपा पार्षद बसी यादव की जेल के गेट पर बुला कर हत्या कर दिया था। ये हत्या वाराणसी के जिला जेल के गेट पर हुई थी। इस हत्या के बाद जिला जेल की सुरक्षा सवालो के घेरे में आ गई थी। बताया जाता है कि मुलकात के बहाने आये बाहर के अपराधियों ने घटना को अंजाम जेल के गेट पर दे दिया था और फरार हो गए थे। इसके बाद जिला और जेल प्रशासन की जमकर किरकिरी हुई थी और फिर जेल के गेट से सड़क तक की दुरी को बाउंड्रीवाल बनी और गेट लगा।

जेल के अन्दर मोनू पहाड़ी की हत्या ने भी दहशत फैलाई थी। अप्रैल 2020 में इटावा जेल में बंद कानपुर के कुख्यात मोनू पहाड़ी का जेल के अन्दर अन्य कैदियों से झगड़ा हो गया था। इस झगड़े में कैदियों ने पीट पीट कर मोनू पहाड़ी की हत्या कर दिया था। कानपुर जरायम की दुनिया के बेताज बादशाह के तौर पर जाना जाने वाला दुर्दांत अपराधी जो दिन दहाड़े घटनाओं को अंजाम देने के लिए कुख्यात था की हत्या पीट पीट कर होने के बाद से कानपुर के कारोबारियों और पुलिस ने राहत की साँस ज़रूर लिया था। मोनू पहाड़ी का गैंग डी-2 इस हत्या के बाद लगभग खत्म हो चूका है।

चित्रकूट हत्याकाण्ड के पहले सबसे बड़ी हत्या जेल के अन्दर मुन्ना बजरंगी की मानी जारी है। वर्ष 2018 में कुख्यात शूटर मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में पश्चिम उत्तर प्रदेश के अपराधी सुनील राठी ने गोलियों से छलनी करके हत्या कर दिया था। एक दुर्दांत शूटर इस प्रकार से मारा जायेगा किसी ने इसकी कल्पना भी नही किया था। आज तक इस मामले में भले गैगवार का नाम दिया जाता रहा है, मगर ये गैंगवार क्यों हुई इसका आज तक खुलासा नही हो पाया है क्योकि सुनील राठी और मुन्ना बजरंगी के बीच पहले कोई अदावत नही थी। अदावत कब और क्यों हुई इसका खुलासा होना बाकी है।

अब जेल में मुकीम काला, और भाई मेराज की हत्या ने जेल के अन्दर “सब कुछ चंगा है” की कलई खोल दिया है, भले जेल अधीक्षक और जेलर को सस्पेंड कर दिया गया हो मगर सवाल अभी भी अन्धुरे है कि जेल की इतनी तगड़ी व्यवस्था होने के बावजूद भी जेल के अन्दर असलहा कैसे पंहुचा। प्रतिबंधित बोर के असलहो से इतना तांडव हुआ आखिर जेल प्रशासन कैसे खुद की ज़िम्मेदारी से मुकर सकता है। जेल अधीक्षक और जेलर पर कार्यवाही केवल क्या इस जघन्य कांड को दबाने का एक बहाना मात्र है। क्योकि जेल का हर एक सुरक्षा कर्मी इसका जवाबदेह होगा।

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