इलेक्ट्रिक इंजिनियर रहे नीतीश कुमार पहले भी दे चुके है कई बड़े झटके, क्या इस बार भाजपा को मिलेगा नीतीश से झटका, जाने कब कब दिया है झटका, भाजपा और जदयू में बढती दुरी से लगने लगे सियासी कयास

तारिक आज़मी

बिहार में राजनैतिक उठापटक चल रही है। एनडीए के घटक दल जनता दल यूनाइटेड और भाजपा का गठबंधन जल्द के कगार पर पहुच चूका है। इस गठबंधन में चल रही उठापटक पर कयास लगाया जा रहा है कि जल्द ही यह गठबंधन टूट जाएगा और नीतीश कुमार कांग्रेस, वाम दलों और आरजेडी के साथ मिल कर सरकार बना सकते है। सियासी हलचल पर नज़र डाले तो जदयू तथा भाजपा गठबंधन अधिकतम एक दो दिनों में टूट सकता है।

दोनों दलों यानि भाजपा और जदयू के बीच कई मामलो में दुरी होती जा रही है। जेडीयू का आरोप है कि बीजेपी उनकी पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रही है और आरसीपी सिंह के ज़रिए जेडीयू को नुक़सान पहुंचाने में लगी है। रविवार को पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी पर हमला भी बोला।  जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन ने बीजेपी का नाम लिए बिना उन पर साजिश रचने का आरोप लगाया और उन्हें “उचित समय पर” बेनकाब करने की धमकी दी थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को अपनी पार्टी के सभी विधायकों और सांसदों की बैठक भी बुलाई है, जिससे की गठबंधन टूटने की अटकलें तेज हो गई हैं। कल शाम राज्य के उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे और बिहार इकाई के अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल के नेतृत्व में बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री और नीतीश कुमार के करीबी विजय कुमार चौधरी से मुलाकात हुई थी। तभी से चर्चा है कि तारकिशोर नीतीश से मिलेंगे। ये मुलाकात आज हो सकती है। मुलाकात के दौरान राज्य की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा होने की संभावना है।

अब अगर गुज़रे वक्त पर ध्यान दे तो इलेक्ट्रिक इंजिनियर नीतीश कुमार अपने सियासी सफ़र में झटके देने के उस्ताद रहे है। उन्होंने साल 1994 में नीतीश कुमार ने अपने पुराने सहयोगी लालू यादव का साथ छोड़कर लोगों को चौंका दिया था। जनता दल से किनारा करते हुए नीतीश ने जॉर्ज फ़र्नान्डिस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया था और 1995 के बिहार विधानसभा चुनावों में लालू के विरोध में उतरे लेकिन चुनाव में बुरी तरह से उनकी हार हुई। हार के बाद वो किसी सहारे की तलाश में थे।

इसी तलाश के दौरान उन्होंने 1996 में बिहार में कमजोर मानी जाने वाली पार्टी बीजेपी से हाथ मिला लिया। बीजेपी और समता पार्टी का ये गठबंधन अगले 17 सालों तक चला। हालांकि, इस बीच साल 2003 में समता पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) बन गई। जेडीयू ने बीजेपी का दामन थामे रखा और साल 2005 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की। इसके बाद साल 2013 तक दोनों ने साथ में सरकार चलाई। साल 2013 में बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2014 के लिए जब नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया तो नीतीश कुमार को यह रास नहीं आया और उन्होंने बीजेपी से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया।

दरअसल, नरेंद्र मोदी से नीतीश कुमार के वैचारिक मतभेद पुराने रहे हैं।  राजद के सहयोग से सरकार चला रहे नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और कुर्सी अपनी सरकार के मंत्री और दलित नेता जीतन राम मांझी को सौंप दी। वे खुद बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की तैयारी में जुट गए। लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी से पटखनी खा चुके नीतीश कुमार ने साल 2015 में पुराने सहयोगी लालू यादव और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर  विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में आरजेडी जेडीयू से अधिक सीट लेकर आई। बावजूद इसके नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री व बड़े बेटे तेजप्रताप यादव स्वास्थ्य मंत्री बने।

20 महीने तक दो पुराने साथियों की सरकार ठीक से चलती रही लेकिन 2017 में दोनों पार्टियों में खटपट शुरू हो गई। अप्रैल 2017 में शुरू हुई खटपट ने जुलाई तक गंभीर रूप ले लिया, जिसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने योजनाबद्ध तरीके से इस्तीफा दे दिया। चूंकि, विधानसभा में तभी बीजेपी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी थी, इसलिए बीजेपी ने मध्यावधि चुनाव से इंकार करते हुए पुराने सहयोगी को समर्थन देने का निर्णय लिया और नीतीश कुमार फिर एक बार मुख्यमंत्री बन गए। सत्ता पलट का ये पूरा घटनाक्रम नाटकीय तरीके से 15 घंटे के भीतर हुआ। 2020 के विधान सभा चुनावों में बीजेपी ने जेडीयू से ज्यादा सीटें जीतीं, बावजूद नीतीश कुमार ने सातवीं बार सीएम पद की शपथ ली। लेकिन एक बार फिर बिहार में सत्ता संभाल रही बीजेपी-जेडीयू के बीच कलह ने बड़ा रूप ले लिया है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि 21 महीने के बाद नीतीश कुमार फिर से पलटी मार सकते हैं और पुराने साथी लालू यादव की राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं।

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