संभल शाही जामा मस्जिद के रंग रोगन प्रकरण में एएसआई ने हाई कोर्ट से कहा ‘मस्जिद को नए रंग रोगन की ज़रूरत नहीं’, जबकि तस्वीरे बता रही है कि बाहरी दीवार पर कई जगह पेंट उखड गए है

ईदुल अमीन
डेस्क: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने संभल में मुगलकालीन शाही जामा मस्जिद को समग्र रूप से ‘अच्छी स्थिति’ में पाया है और निष्कर्ष निकाला है कि इसे नए रंग-रोगन की आवश्यकता नहीं है, हालांकि इमारत के बाहरी हिस्से का पेंट उखड़ गया है और कुछ जगहों पर ‘कुछ क्षति के संकेत’ भी मिलते हैं।

बताते चले कि संभल की शाही जामा मस्जिद, जिसके बारे में हिंदू कार्यकर्ता दावा कर रहे हैं कि यह एक प्राचीन मंदिर का स्थल है, के रखवाले इमारत को रमज़ान के पाक महीने के लिए रंग-रोगन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संभल कोर्ट में सिविल मुकदमे में हिंदू वादियों ने मस्जिद समिति के मरम्मत और रखरखाव कार्य करने के अनुरोध का विरोध किया है और आरोप लगाया है कि यह संरचना को ख़राब करने का प्रयास है।
मस्जिद तक पहुंच की मांग करने वाले सिविल मुकदमे में वकील और मुख्य वादी हरि शंकर जैन ने तर्क दिया कि मरम्मत और रखरखाव कार्य की आड़ में मस्जिद के रखवाले ‘हिंदू मंदिर की कलाकृतियों, चिह्नों और प्रतीकों’ को ख़राब कर देंगे। जिसके बाद यह मामला हाई कोर्ट पंहुचा और हाई कोर्ट ने एएसआई से जवाब तलब किया। जिसके बाद एएसआई ने मुत्वल्लियो की मौजूदगी में मस्जिद का सर्वेक्षण किया।
एएसआई ने मस्जिद को रंग रोगन की ज़रूरत नहीं होने की अपनी ये टिप्पणियां इलाहाबाद हाईकोर्ट में 27 फरवरी को अदालत के आदेश पर मस्जिद का तत्काल निरीक्षण करने के बाद प्रस्तुत की गई नौ पन्नों की रिपोर्ट में कीं। निरीक्षण संयुक्त महानिदेशक एएसआई मदन सिंह चौहान, निदेशक (स्मारक) जुल्फिकार अली और एएसआई मेरठ सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद् विनोद सिंह रावत की तीन सदस्यीय टीम द्वारा मस्जिद के मुतवल्लियों (देखरेख करने वालों) के साथ किया गया था।
एएसआई ने कहा, ‘टीम के अवलोकन के अनुसार उक्त आधुनिक इनेमल पेंट अभी भी अच्छी स्थिति में है और इसे फिर से पेंट करने की कोई तत्काल आवश्यकता नहीं है।’ हालांकि, स्मारक के बाहरी हिस्से में पेंट के उखड़ने के कुछ निशान हैं, लेकिन इस स्थिति में फिलहाल तत्काल मरम्मत की आवश्यकता नहीं है।’ जफर अली ने बताया कि हर साल रमजान और ईद-उल-फितर के दौरान मस्जिद की पुताई की जाती है। उन्होंने कहा, ‘यह एक पुरानी परंपरा है जिसे हर साल निभाया जाता है।’ उन्होंने आगे कहा कि मस्जिद समिति ने इस बार संभल मुद्दे की संवेदनशील प्रकृति के कारण पहले अनुमति मांगी थी। उन्होंने कहा, ‘हम कोई पचड़ा नहीं चाहते हैं।’
मस्जिद का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व दिशा से है जो एक बड़े लकड़ी के दरवाजे के साथ एक चौड़े द्वार से खुलता है। एएसआई ने आगे कहा कि दरवाजे के ऊपर का बीम बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है जिसे बदलने की जरूरत है। एएसआई ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि मस्जिद की संरचना में किए गए सभी आधुनिक कामों का संरक्षण और विज्ञान विंग द्वारा गहन अध्ययन किया जाना आवश्यक होगा। संस्था ने यह भी कहा कि मस्जिद के पीछे (पश्चिम) और उत्तर की ओर कई छोटे कक्षों का इस्तेमाल प्रबंध समिति द्वारा भंडारण उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। एएसआई ने कहा कि ये कक्ष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं, खासकर छतें, जो लकड़ी के तख्तों पर टिकी हैं और कमज़ोर हैं। एएसआई ने उल्लेख किया कि मस्जिद के प्रवेश द्वार के साथ-साथ प्रार्थना कक्ष के पीछे और उत्तरी तरफ स्थित कक्षों में ‘कुछ क्षति के संकेत’ हैं।’
एएसआई, उत्तर प्रदेश सरकार और हिंदू वादी ने इस बिंदु का उपयोग यह तर्क देने के लिए किया कि मस्जिद समिति को संरचना को रंगने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, मस्जिद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एसएफए नकवी ने अदालत में कहा कि पिछले कई दशकों से मस्जिद में पुताई और अन्य मरम्मत का काम मस्जिद की प्रबंध समिति ही कर रही है और एएसआई ने इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। उन्होंने कहा कि पिछले साल मस्जिद के रखरखाव और पुताई पर करीब 4 लाख रुपये खर्च किए गए थे।
नकवी ने कहा कि मस्जिद में पुताई और आवश्यक मरम्मत कार्य की अनुमति देने के लिए 8 फरवरी को एएसआई को आवेदन भेजा गया था। उन्होंने कहा, ‘समझौते पर लगभग एक सदी पहले हस्ताक्षर किए गए थे और एएसआई ने मस्जिद की वार्षिक पुताई पर कभी आपत्ति नहीं जताई, जो कि इसके बाहरी हिस्से, दीवारों को संरक्षित करने के लिए आवश्यक है।’ नकवी ने कहा कि एएसआई के निष्कर्ष और वह निष्कर्ष जिसमें उन्होंने मस्जिद की पुताई कराने के अनुरोध को खारिज कर दिया, दोनों विरोधाभासी प्रकृति के हैं।











