इंदौर की सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब पर सवाल…!, दक्षिणपंथी नेता के फरमान पर कपड़ा बाज़ार से मुसलमानों को क्यों निकाला जा रहा है?, पुलिस प्रशासन आखिर इन पोस्टरों पर मौन क्यों?

PNN24 न्यूज़ के एक सहयोगी ने इंदौर से एक बड़ी खबर दिया है....! खबर के मुताबिक सैकड़ो साल पुरानी कपडा मार्किट जो इंदौर के गंगा जमुनी तहजीब के लिए मशहूर है, से मुस्लिम दुकानदारो और कर्मचारियों को निकाले जाने की चेतावनी स्थानीय एक दक्षिणपंथी नेता द्वारा दिया गया है। जिसके बाद उहा-पोह की स्थित इस कारण भी बनी है कि शिकायतों के बावजूद भी पुलिस मामले में जाँच की बात कह रही है।

तारिक आज़मी

इंदौर: देश का सबसे स्वच्छ शहर। जहाँ ‘पोहा-जलेबी’ की मिठास के साथ-साथ कारोबार की रफ्तार भी तेज़ है। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से इस ‘दिल’ वाले शहर के एक मशहूर बाज़ार से जो खबरें आ रही हैं, वो न सिर्फ कड़वाहट घोल रही हैं, बल्कि सदियों पुराने व्यापारिक भाईचारे पर एक बड़ा सवालिया निशान भी लगा रही हैं। बात हो रही है इंदौर के शीतला माता कपड़ा बाज़ार की।

सवाल सीधा है: क्या वाकई इंदौर के इस बाज़ार से मुस्लिम कर्मचारियों और व्यापारियों को निकाला जा रहा है? और अगर हाँ, तो क्यों?

अचानक क्यों टूटा दशकों पुराना रिश्ता?

शीतला माता बाज़ार, अपनी तंग गलियों और रंग-बिरंगे कपड़ों के लिए जाना जाता है। यहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदायों के लोग, कंधे से कंधा मिलाकर, दशकों से काम करते आ रहे हैं। हिंदू मालिक, मुस्लिम कारीगर, सेल्समैन और दर्जी।।। यह बाज़ार इसी ‘सामंजस्य’ की नींव पर खड़ा है।

लेकिन हाल ही में, एक स्थानीय राजनीतिक व्यक्ति के कथित बयान और कुछ हिंदूवादी संगठनों के ‘अल्टीमेटम’ के बाद, बाज़ार का माहौल बदल गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुकान मालिकों से कहा गया है कि वे मुस्लिम कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दें।

इसका नतीजा?

मीडिया रिपोर्ट्स और ज़मीनी हकीकत बताती है कि रातों-रात, कई मुस्लिम सेल्समैन और कर्मचारियों को उनकी नौकरी से हटा दिया गया है। ये वे लोग हैं, जिन्होंने अपनी जवानी इस बाज़ार की सेवा में गुजार दी।

‘पेट पालने’ की चिंता बनाम ‘सुरक्षा’ का डर

इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं।

  • प्रभावित कर्मचारियों की बात: जिन लोगों की नौकरी गई है, उनकी आँखों में अब सिर्फ ‘बेरोजगारी’ का डर है। एक सेल्समैन (नाम न छापने की शर्त पर) ने PNN24 को बताया, “मैंने 20 साल दुकान को दिए। अब अचानक कह दिया, कल से मत आना। मेरा घर कैसे चलेगा? बच्चों की फीस कैसे भरूंगा? क्या हमारे ही देश में, हमें काम करने की इज़ाज़त नहीं मिलेगी?” मुस्लिम समुदाय ने इसे ‘आर्थिक बहिष्कार’ बताते हुए पुलिस में शिकायतें भी दर्ज कराई हैं।
  • संगठनों और व्यापारियों की दलील: दूसरी ओर, कुछ व्यापारियों और हिंदूवादी संगठनों का कहना है कि यह ‘लव जिहाद’ जैसी घटनाओं को रोकने के लिए ज़रूरी है। उनके अनुसार, कुछ मुस्लिम सेल्समैन, हिंदू लड़कियों और महिलाओं के साथ काम करने के दौरान ‘गलत व्यवहार’ करते हैं। यही कारण है कि ‘माताएं-बहनें निडर रूप से बाज़ार में पधारें’ जैसे पोस्टर भी लगाए गए हैं। हालांकि, कई पुराने व्यापारी इस दलील से सहमत नहीं हैं, उनका कहना है कि उनके मुस्लिम कर्मचारी दशकों से भरोसेमंद रहे हैं।

व्यापार पर बुरा असर

यह विवाद केवल धर्म या राजनीति तक सीमित नहीं है, यह सीधे तौर पर बाज़ार की अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहा है। कई दुकानदारों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वर्षों पुराना विश्वास टूटने से व्यापार धीमा हो गया है। एक कपड़ा व्यापारी ने कहा, “हमने हमेशा इंसान को देखकर काम दिया, धर्म को नहीं। आज माहौल खराब हो रहा है, जिसका सीधा असर हमारे मुनाफे पर पड़ रहा है। हमारा बाज़ार तो भरोसे और कारीगरी पर चलता था।”

प्रशासन की भूमिका

पुलिस और प्रशासन ने इस मामले की निष्पक्ष जाँच का आश्वासन दिया है। डीसीपी स्तर के अधिकारी जाँच कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक फरमान या समूह के अल्टीमेटम पर, संविधान से मिले काम के मौलिक अधिकार का हनन किया जा सकता है?

यह घटना इंदौर की पहचान को धूमिल कर रही है। यह केवल नौकरियों से निकालने का मामला नहीं है, बल्कि उस भाईचारे पर गहरी चोट है, जिसने इंदौर को देश के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में से एक बनाया है। यह देखना बाकी है कि शहर की ये गंगा-जमुनी तहज़ीब इस नई ‘आर्थिक दीवार’ को कैसे तोड़ती है।

क्या कहता है स्थानीय व्यापार संगठन

शीतलामाता कपड़ा बाज़ार के अध्यक्ष हेमा पंजवानी ने बताया कि 25 अगस्त को बंद कमरे की एक बैठक में एकलव्य सिंह गौड़ ने व्यापारियों के प्रतिनिधियों से बात की थी। इसी बैठक में शीतलामाता कपड़ा बाज़ार के व्यापारियों के प्रतिनिधियों के लिए यह फ़रमान जारी किया। इसके बाद एकलव्य सिंह गौड़ ने स्थानीय मीडिया को कई बार दिए अपने बयान में कहा, ‘मेरे पास कई बार लव जिहाद की शिकायतें आ चुकी हैं। यह षडयंत्र अब कोई कल्पना या मनगढ़ंत बात नहीं है। हमारे कपड़ा बाज़ार में ज़्यादातर महिलाएं आती हैं और मुस्लिम सेल्समैन उन्हें लव जिहाद में फंसा लेते हैं।’

क्या कहते है ज़िम्मेदार ?

एकलव्य सिंह गौड़ भले ही निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं, लेकिन बाज़ार में उनका दबदबा है। स्थानीय हमारे सहयोगी ने बताया कि उनके बातो को फरमान की तरह माना जाता है। ऐसे में शीतलामाता कपड़ा बाज़ार के अध्यक्ष हेमा पंजवानी ने खबरनवीसो से कहा, ‘हमारे एकलव्य भैया का आदेश था कि बाज़ार से मुस्लिम सेल्समैन और व्यापारियों को बाहर निकला जाए। उनके पास कई बार लोग लव जिहाद के मुद्दे को लेकर गए थे।’ जबकि जिन मुस्लिम मतदाताओं के बल पर अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता अपनी राजनीत चमकाते है वह मुस्लिम नेता भी पल्ले झाड रहे है। बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष एजाज़ अंसारी ने कहा कि वो फिलहाल ‘टूर पर हैं’ और लौटने के बाद इस मामले को “डिटेल में समझेंगे और फिर उचित कदम उठाएंगे”।

व्यापार मंडल के अध्यक्ष या फिर दक्षिणपंथी संगठन के कायकर्ता

इंदौर कपड़ा व्यापारी संघ के अध्यक्ष हेमा पंजवानी कहते हैं, “हिंद रक्षा संगठन के हमारे भैया एकलव्य सिंह गौड़ का आदेश था हम उसका पालन कर रहे हैं। उन्होंने हर दुकानदार को बुलाकर समझाया कि बाज़ार में जो चल रहा है, उसको तुरंत बंद किया जाए… बहुत सारे मुस्लिम लोग अब यहां से जा चुके हैं।” हमारे यह पूछने पर कि अध्यक्ष के नाते आप बताएं कि वो कौन सा कारण है जिसके चलते मुस्लिम समुदाय के लोगों को बाज़ार से निकाला जा रहा है, पंजवानी कहते हैं, “यहां मुस्लिम सेल्समैन हिन्दू लड़कियों और महिलाओं को फंसाकर लव जिहाद करते हैं”। जब उनसे पूछा गया कि क्या किसी मुस्लिम कर्मचारी या दुकानदार के ख़िलाफ़ कोई औपचारिक शिकायत आई है, तो उनका जवाब था, “मेरे पास इसकी कोई जानकारी नहीं है।”

इस बीच “जिहादी मानसिकता से छुटकारा दिलाने के लिए धन्यवाद” के पोस्टर इंदौर के बाज़ार में कुछ और हक़ीकत बयां कर रहे हैं। जबकि इंदौर पुलिस के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त राजेश दंडोतिया ने कहा कि अब तक उनके पास ऐसी कोई शिकायत नहीं आई है। दूसरी तरफ हमारे स्थानीय एक सहयोगी ने बताया है कि स्थानीय मीडिया से बात करते हुवे पुलिस ने दो शिकायतों के जांच की बात किया है। बड़ा सवाल आपके दिमाग में अगर आ रहा ई कि ऐसे नफरती पोस्टर के बाद भी पुलिस शिकायत नहीं है कि बात करे तो आँखे किसकी धोखा खा रही है ये अच्छी तरह समझा जा सकता है।

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