आज भारत का नाज़, कल नफ़रत का निशाना: जेमिमा रोड्रिग्स की हिम्मत भरी दास्तान…!

शफी उस्मानी

PNN24 न्यूज़, नई दिल्ली। जब कोई खिलाड़ी विश्व कप सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ रिकॉर्ड-तोड़ 127 रन की नाबाद पारी खेलकर भारत को फाइनल में पहुंचाता है, तो पूरा देश उसके नाम का जयकारा लगाता है। आज जेमिमा रोड्रिग्स भारत की नई क्रिकेटिंग हीरो हैं, लेकिन यह बात कम लोग जानते हैं कि ठीक एक साल पहले यही खिलाड़ी दक्षिणपंथी नफ़रत और धार्मिक ट्रोलिंग का निशाना बन चुकी थी। यह केवल क्रिकेट की कहानी नहीं है, यह धैर्य, आस्था और पूर्वाग्रह पर प्रतिभा की जीत की कहानी है।

जब धर्म की वजह से ‘निशाना’ बनीं जेमिमा

पिछले एक साल में जेमिमा ने न केवल अपने खराब फॉर्म से लड़ाई लड़ी, बल्कि उन्हें एक ऐसे विवाद का सामना करना पड़ा जिसका क्रिकेट से कोई लेना-देना नहीं था:

  • ‘धर्मांतरण’ का आरोप और क्लब विवाद: अक्टूबर 2024 के आसपास, मुंबई के एक प्रतिष्ठित खार जिमखाना क्लब ने जेमिमा की सदस्यता रद्द कर दी थी। क्लब अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि जेमिमा के पिता, जो उनके कोच भी हैं, क्लब परिसर में धार्मिक गतिविधियों का आयोजन कर रहे थे, और उन पर धर्मांतरण के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए।
  • ट्रोलिंग और मानसिक आघात: इस विवाद के बाद, जेमिमा और उनका परिवार सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी समूहों के निशाने पर आ गया। क्रिकेट में उनके प्रदर्शन की आलोचना करने के बजाय, कई लोगों ने उनके ईसाई धर्म के कारण उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि कुछ नफरत भरी धमकियाँ भी दी गईं, जिसने उन्हें मानसिक रूप से गहरे आघात में डाल दिया।

जेमिमा को 2022 वर्ल्ड कप टीम से बाहर किए जाने का दर्द पहले से ही था, और इन बाहरी हमलों ने उन्हें और तोड़ दिया था।

नफ़रत पर आस्था और बल्ले की जीत

जेमिमा ने इस मुश्किल दौर का जिक्र सेमीफाइनल जीतने के बाद खुद किया। भावुक होकर उन्होंने कहा:

“पिछले कुछ महीने बहुत मुश्किल थे, मैं मानसिक तनाव और चिंता से गुज़र रही थी और लगभग हर दिन रोती थी।”

उन्होंने बताया कि इस मुश्किल दौर में उनका ईश्वर में अटूट विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने क्रिकेट पर फिर से ध्यान केंद्रित किया, मुंबई के कठिन पिचों पर प्रैक्टिस की और वापसी के लिए हर तरह के मुश्किल गेंदबाजों (महिला और पुरुष) का सामना किया।

उनकी 127 रनों की ऐतिहासिक पारी केवल एक शतक नहीं, बल्कि उन सभी नकारात्मकता, आलोचना और धार्मिक पूर्वाग्रहों का मुंहतोड़ जवाब थी जिसका उन्होंने एक साल तक सामना किया। जब वह मैच जीतने के बाद भावुक होकर अपने पिता को फ्लाइंग किस दे रही थीं, तब उनकी आँखों के आँसू हार के नहीं, बल्कि संघर्ष और शानदार जीत के थे।

आज, जब जेमिमा रोड्रिग्स देश के लिए इतिहास रच रही हैं, तो उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि प्रतिभा, खेल भावना और राष्ट्रीय गौरव किसी भी नफ़रत या कट्टरता से कहीं अधिक बड़े होते हैं। भारत का गौरव उसके खिलाड़ियों के धर्म में नहीं, बल्कि उनके प्रदर्शन में बसता है।

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