PNN24 News: नया लेबर कोड क्या है, जिसका कई मज़दूर संगठन कर रहे हैं विरोध…?

शफी उस्मानी

डेस्क: देश में जल्द ही नया लेबर कोड (New Labour Codes) लागू हो सकता है। सरकार का दावा है कि ये कोड्स दशकों पुराने और जटिल श्रम कानूनों को सरल बनाकर, कामगारों के हितों की रक्षा करेंगे और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस को बढ़ावा देंगे। हालांकि, देश के कई बड़े मज़दूर संगठन (Trade Unions) इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।

आखिर ये नया लेबर कोड क्या है, इसमें क्या बदलाव किए गए हैं, और मज़दूर संगठन इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? आइए समझते हैं।

क्या है नया लेबर कोड?

दरअसल, केंद्र सरकार ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर चार व्यापक कोड्स में बदल दिया है। ये कोड्स संसद से पारित हो चुके हैं, लेकिन इन्हें लागू करने के लिए राज्यों को भी अपने नियम बनाने होंगे, जिस पर काम चल रहा है।

ये चार कोड्स हैं:

  1. वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019): इसमें वेतन, बोनस और समान पारिश्रमिक से जुड़े कानून शामिल हैं।
  2. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020): इसमें ट्रेड यूनियन, काम की शर्तें, और औद्योगिक विवादों से जुड़े नियम हैं।
  3. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020): इसमें भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, बीमा, और मातृत्व लाभ जैसे सामाजिक सुरक्षा प्रावधान शामिल हैं।
  4. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तों संहिता, 2020 (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020): इसमें कर्मचारियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की शर्तों से जुड़े नियम हैं।

मुख्य बदलाव क्या हैं?

इन कोड्स में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:

1. काम के घंटों में बदलाव (Work Hours)

  • बड़ा बदलाव: लेबर कोड्स के तहत, अधिकतम दैनिक काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 घंटे तक करने का प्रावधान है (हालांकि, साप्ताहिक अधिकतम 48 घंटे की सीमा बनी रहेगी)।
  • मतलब: अब कंपनियां 4-दिन का वर्किंग वीक अपना सकती हैं, यानी हफ्ते में 4 दिन 12-12 घंटे काम और फिर लगातार 3 दिन की छुट्टी।

2. ग्रेच्युटी के नियम (Gratuity Rules)

  • बड़ा बदलाव: फिक्स्ड-टर्म (निश्चित अवधि) के कर्मचारियों के लिए भी ग्रेच्युटी का प्रावधान लाया गया है। पहले, एक ही संस्थान में 5 साल की लगातार सेवा के बाद ही ग्रेच्युटी मिलती थी।
  • अब क्या होगा: फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को उनके कार्यकाल के अनुपात में ग्रेच्युटी मिलेगी, भले ही उनका कार्यकाल 5 साल से कम हो।

3. सामाजिक सुरक्षा का दायरा (Social Security Coverage)

  • बड़ा बदलाव: पहली बार गिग वर्कर्स (जैसे ओला/उबर ड्राइवर्स, स्विगी/ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर्स) और प्लैटफॉर्म वर्कर्स को भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है।
  • फायदा: सरकार ऐसे कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड बनाने की योजना बना रही है।

4. छंटनी के नियम (Layoff Rules)

  • बड़ा बदलाव: औद्योगिक संबंध संहिता के तहत, 300 कर्मचारियों तक वाली कंपनियों को अब कर्मचारियों की छंटनी या यूनिट बंद करने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। यह सीमा पहले 100 कर्मचारियों की थी।
  • मकसद: कंपनियों के लिए कारोबार बंद करना या कर्मचारियों की संख्या कम करना आसान होगा।

मज़दूर संगठन विरोध क्यों कर रहे हैं?

मज़दूर संगठनों का मानना है कि ये कोड्स कामगारों के हितों के बजाय, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के हितों को साधते हैं। विरोध के मुख्य बिंदु ये हैं:

  • बढ़े हुए काम के घंटे (12 घंटे): संगठनों का कहना है कि 12 घंटे की शिफ्ट से श्रमिकों का शारीरिक और मानसिक शोषण बढ़ेगा, और यह दशकों पुरानी 8 घंटे की कार्यदिवस की मांग के विपरीत है।
  • छंटनी आसान करना (300 की सीमा): 300 कर्मचारियों तक छंटनी के लिए सरकारी अनुमति की अनिवार्यता खत्म होने से, लाखों कर्मचारियों की नौकरी असुरक्षित हो जाएगी।
  • मज़दूरों की आवाज़ दबाना: औद्योगिक विवादों में हड़ताल के लिए 60 दिन का नोटिस अनिवार्य करना और नियमों को सख्त करना, मज़दूरों के हड़ताल के अधिकार को कमजोर करता है।
  • कमज़ोर सामाजिक सुरक्षा: गिग और प्लैटफॉर्म वर्कर्स के लिए अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान नहीं है, केवल एक फंड बनाने की बात है, जिससे उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलेगी।

निष्कर्ष

नया लेबर कोड देश में श्रम सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकार इसे रोजगार सृजन और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के लिए ज़रूरी मानती है। वहीं, मज़दूर संगठन इसे कामगारों के अधिकारों का पूंजीपतियों के पक्ष में बलिदान मानते हुए, लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जब तक ये कोड्स लागू नहीं हो जाते, तब तक इस पर बहस जारी रहेगी कि ये बदलाव देश के कामगारों और अर्थव्यवस्था पर क्या असर डालेंगे।

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