‘तेजस्वी का शपथ ग्रहण’ कराने वाले संजय यादव कौन हैं? RJD की हार के बाद क्यों बन गए सबसे बड़े ‘जयचंद’?

शफी उस्मानी

पटना: PNN24 News: बिहार चुनाव के परिणाम आने के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में हार के कारणों पर मंथन शुरू हो गया है। मगर इस मंथन से पहले ही पार्टी के भीतर और महागठबंधन के सहयोगियों के बीच एक नाम जोरदार तरीके से निशाने पर आ गया है—संजय यादव।

संजय यादव, जिन्हें कभी तेजस्वी यादव का ‘चाणक्य’ या ‘राइट हैंड’ कहा जाता था, अब पार्टी की करारी हार के बाद अपनों के ही ‘जयचंद’ वाले आरोपों का सामना कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर संजय यादव कौन हैं, जिनका कद इतना बढ़ गया कि वे लालू परिवार के सदस्यों की नाराज़गी का कारण बन गए और आज हार का ठीकरा उन्हीं पर क्यों फोड़ा जा रहा है?

कौन हैं संजय यादव?

संजय यादव मूल रूप से बिहार के नहीं, बल्कि हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के रहने वाले हैं।

  • पृष्ठभूमि: उन्होंने कंप्यूटर साइंस में Sc. और फिर MBA की पढ़ाई की है। यानी उनका बैकग्राउंड डेटा एनालिसिस और मैनेजमेंट का रहा है, न कि पारंपरिक राजनीति का।
  • तेजस्वी से दोस्ती: संजय यादव और तेजस्वी यादव की दोस्ती पुरानी है, जो कथित तौर पर दिल्ली में क्रिकेट खेलने के दौरान शुरू हुई थी।
  • राजनीतिक उदय: 2012 के आसपास, संजय यादव ने एक प्राइवेट कंपनी की नौकरी छोड़कर ‘फुल-टाइम’ RJD से जुड़ने का फैसला किया। वह 2015 के विधानसभा चुनाव से ही पार्टी की चुनावी रणनीति और सोशल मीडिया को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
  • बढ़ता कद: धीरे-धीरे, वह तेजस्वी यादव के मुख्य सलाहकार बन गए और उनकी हर रैली, प्रेस कॉन्फ्रेंस और गठबंधन की बातचीत में उनके साथ नज़र आने लगे। 2024 में RJD ने उन्हें राज्यसभा सांसद भी बनाया, जिससे पार्टी में उनका कद और बढ़ गया।

निशाने पर क्यों हैं संजय यादव?

संजय यादव पर हार का ठीकरा फूटने के पीछे कई आंतरिक और बाहरी कारण बताए जा रहे हैं, जो उनकी बढ़ती शक्ति से जुड़े हैं:

1. परिवार में नाराज़गी (जयचंद का आरोप)

RJD की हार के बाद तेजस्वी के बड़े भाई तेज प्रताप यादव ने खुले तौर पर ‘जयचंदों’ को हार का ज़िम्मेदार ठहराया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उनका सीधा इशारा संजय यादव की तरफ था। लालू परिवार के कई सदस्यों और पुराने नेताओं को संजय यादव का दखलंदाजी पसंद नहीं है।

आरोप: यह माना जाता है कि तेजस्वी यादव से मिलना-जुलना, टिकट वितरण और रणनीतिक फैसलों में संजय यादव की अनुमति अनिवार्य हो गई थी। इस ‘एंट्री गेट’ (Entry Gate) की भूमिका ने परिवार के सदस्यों और पुराने नेताओं को दरकिनार कर दिया, जिससे भीतर ही भीतर असंतोष पनपा।

2. टिकट वितरण और वित्तीय आरोप

RJD के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने चुनाव से ठीक पहले संजय यादव पर टिकट वितरण में अनियमितता और भारी रकम लेने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे। भले ही इन आरोपों की पुष्टि न हुई हो, लेकिन ये बातें पार्टी के भीतर उनके खिलाफ एक माहौल बनाने में सहायक रहीं।

3. रणनीतिक गलतियाँ

संजय यादव को तेजस्वी के ‘रणनीतिकार’ के रूप में देखा जाता है। हार के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनकी रणनीति में कोई चूक हुई?

  • M-Y से बाहर निकलने की कोशिश: संजय यादव ने तेजस्वी की छवि को ‘MY समीकरण’ (मुस्लिम-यादव) से बाहर निकालकर A to Z की पार्टी बनाने पर ज़ोर दिया था। हालाँकि, चुनावी नतीजों में यह नया समीकरण पूरी तरह से काम नहीं कर पाया।
  • गठबंधन का तालमेल: महागठबंधन के सहयोगियों, खासकर कांग्रेस, के साथ तालमेल में कमी को भी हार का एक कारण बताया जा रहा है। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने हार के लिए सीधे तौर पर तेजस्वी के सलाहकार पर निशाना साधा है।

आगे की राह

संजय यादव पर यह दबाव RJD के लिए एक बड़ा संकट है। वह न केवल तेजस्वी के सबसे करीबी हैं, बल्कि उनके राजनीतिक प्रोजेक्ट के आर्किटेक्ट भी माने जाते हैं। अब, तेजस्वी यादव के सामने यह चुनौती है कि वह कैसे अपने ‘चाणक्य’ को बचाते हैं और साथ ही, पार्टी के असंतुष्ट पुराने नेताओं और परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास बहाल करते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि RJD का शीर्ष नेतृत्व इस हार के बाद संजय यादव की भूमिका पर क्या फैसला लेता है।

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