ED की 10 साल की ‘तेज दौड़’ और दोषसिद्धि का धीमा आँकड़ा! केंद्र ने संसद में बताया पूरा लेखा-जोखा

ईदुल अमीन

नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate – ED) की ताबड़तोड़ कार्रवाईयाँ पिछले एक दशक से लगातार सुर्खियों में रही हैं। विपक्षी दल अक्सर सरकार पर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए ईडी (ED) के दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं। इसी संदर्भ में, केंद्र सरकार ने संसद में ईडी के काम-काज का जो ब्यौरा पेश किया है, वह बेहद चौंकाने वाला है।

10 साल में 6,000 से अधिक केस, सज़ा सिर्फ़ 120 को

केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले 10 वर्षों के दौरान 6,000 से अधिक मामले (More than 6,000 cases) दर्ज किए हैं। यह संख्या बताती है कि भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी मुद्रा उल्लंघन जैसे मामलों में एजेंसी ने कितनी तेज़ी से काम किया है।

मगर, जब बात इन मामलों में दोषसिद्धि (Conviction) की आती है, तो तस्वीर बिलकुल बदल जाती है:

  • दर्ज मामले (Total Cases Registered): 6,000+
  • दोषसिद्धि वाले मामले (Conviction Cases): केवल 120

इसका सीधा मतलब है कि ईडी द्वारा दर्ज किए गए हज़ारों मामलों में, दोषसिद्धि की दर (Conviction Rate) बहुत कम है। यह आँकड़ा उन दावों को बल देता है जिनमें कहा जाता है कि कई केस मज़बूत कानूनी आधार के बजाय दबाव बनाने” या राजनीतिक कारणों” से दर्ज किए जाते हैं।

क्यों है दोषसिद्धि का आँकड़ा इतना कम?

ईडी, जो मुख्य रूप से मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत कार्रवाई करती है, उसे कानूनी पेचीदगियों और लंबी न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। हालांकि, इतने कम दोषसिद्धि के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:

  1. जांच की गुणवत्ता: कई बार विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि जांच में पर्याप्त सबूतों की कमी होती है, जिससे मामला अदालत में टिक नहीं पाता।
  2. कानूनी प्रक्रिया की जटिलता: PMLA के तहत सबूत इकट्ठा करना और उन्हें कोर्ट में साबित करना अन्य कानूनों की तुलना में अधिक जटिल होता है।
  3. न्यायिक देरी: भारतीय न्यायिक प्रणाली में मामलों के निपटारे में लगने वाला लंबा समय भी दोषसिद्धि के आँकड़े को प्रभावित करता है।

विपक्षी दलों के आरोपों को बल

विपक्षी नेताओं ने इस आँकड़े को अपनी बात साबित करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बनाया है। उनका तर्क है कि अगर 98% से अधिक मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं या उन पर दोष सिद्ध नहीं हो पाता, तो यह स्पष्ट संकेत है कि ईडी का उपयोग डराने-धमकाने वाले हथियार के रूप में किया जा रहा है।

यह डेटा इस बात को स्पष्ट करता है कि कार्रवाई की संख्या (Number of actions) तो बहुत अधिक है, लेकिन कानूनी सफलता (Legal success) का अनुपात बहुत कम है, जो देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसियों में से एक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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