100 साल का सफर: कैसे ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे के साथ शुरू हुई CPI, जानें भारतीय साम्यवाद के उदय से पतन तक की पूरी कहानी

तारिक आज़मी

डेस्क: भारतीय राजनीति के इतिहास में साल 1925 एक मील का पत्थर है। इसी साल देश में दो ऐसे संगठनों की नींव पड़ी जिनकी विचारधारा एक-दूसरे के धुर विरोधी थी। एक तरफ नागपुर में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (RSS) बना, तो दूसरी तरफ कानपुर में ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) का जन्म हुआ। आज जहाँ संघ अपने सबसे मजबूत दौर में है,

वहीं सीपीआई अस्तित्व के संघर्ष से जूझ रही है। आइए, PNN24 News के साथ मुड़कर देखते हैं इस पार्टी के 100 साल के सफर को।

  1. रूसी क्रांति और भारत में साम्यवाद की दस्तक 1917 की रूसी (बोल्शेविक) क्रांति ने पूरी दुनिया के शोषितों को एक नया रास्ता दिखाया। 1920 के दशक में भारत में भी युवाओं का मोहभंग अहिंसक असहयोग आंदोलन से होने लगा था। क्रांतिकारी, मजदूर और किसान सामाज और राजनीति के नए मार्ग खोज रहे थे। इसी दौर में एम.एन. रॉय जैसे नेताओं ने विदेशों में पार्टी बनाने की कोशिश की, लेकिन असली जड़ें भारत की जमीन पर जमीं।
  2. 26 दिसंबर 1925: कानपुर का ऐतिहासिक सम्मेलन क्रांतिकारी सत्यभक्त ने कानपुर में ‘भारतीय साम्यवाद दल’ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन की घोषणा की। 26 से 28 दिसंबर 1925 तक चले इस सम्मेलन में करीब 500 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। मौलाना हसरत मोहानी (जिन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा दिया) ने इसे किसानों और मजदूरों का आंदोलन बताया।
  3. ब्रितानी हुकूमत के षडयंत्र और जेल की सलाखें अंग्रेज सरकार साम्यवादी विचारों से खौफ खाती थी। कम्युनिस्टों को कुचलने के लिए कई मुकदमे चलाए गए:
  • पेशावर षडयंत्र केस (1922-23)
  • कानपुर बोल्शेविक षडयंत्र केस (1924)
  • मेरठ षडयंत्र केस (1929): इसमें जवाहरलाल नेहरू और गांधी जी ने भी कम्युनिस्टों का समर्थन किया।
  1. 1940 का दशक: कला, संस्कृति और जन-आंदोलन CPI ने केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि कला और साहित्य में भी क्रांति की। ‘इप्टा’ (IPTA) और प्रगतिशील लेखक संघ के जरिए कैफी आज़मी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी और ज़ोहरा सहगल जैसी हस्तियों ने पार्टी के विचार को जन-जन तक पहुँचाया। अकाल और युद्ध के समय पार्टी ने ‘धरती के लाल’ जैसे आंदोलनों से जनता का दिल जीता।
  2. 1957: दुनिया की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार आजादी के बाद 1957 में केरल में इतिहास रचा गया। दुनिया में पहली बार किसी कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सत्ता हासिल की और ई.एम.एस. नंबूदरीपाद मुख्यमंत्री बने। हालाँकि, 1959 में नेहरू सरकार ने इसे बर्खास्त कर दिया।
  3. 1964 की टूट और ढलान का दौर रणनीतिक मतभेदों के चलते 1964 में पार्टी दो फाड़ हो गई और CPI(M) का जन्म हुआ। इसके बाद पार्टी की ताकत कम होती गई। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन ने भारतीय वामपंथ को गहरा झटका दिया।

आज की स्थिति: आज सीपीआई के पास संसद में केवल कुछ ही सदस्य बचे हैं। बिहार जैसे पुराने गढ़ कमजोर हो चुके हैं। विचारक अनिल राजिमवाले कहते हैं, नौजवान जुड़ रहे हैं, लेकिन बदलाव के मुताबिक कम्युनिस्टों को खुद को बदलना होगा।”

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