“अरावली को तबाह करने की तैयारी”: 100 मीटर वाले नियम से 90% पहाड़ सुरक्षा से बाहर, जयराम रमेश ने मोदी सरकार की नई परिभाषा को बताया ‘विनाशकारी’

निलोफर बानो
नई दिल्ली: उत्तर भारत की ‘प्राकृतिक ढाल’ कही जाने वाली अरावली पहाड़ियों के भविष्य पर संकट गहरा गया है। पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार की अरावली के लिए तय की गई ‘नई परिभाषा’ पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आंकड़ों के साथ दावा किया है कि इस नए नियम के बाद अरावली का अधिकांश हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा और खनन माफियाओं के लिए चारागाह बन जाएगा।

केंद्र सरकार की सिफारिशों के बाद अब अरावली की परिभाषा बदल दी गई है। नई परिभाषा के अनुसार, आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर (328 फीट) ऊंचे हिस्से को ही ‘अरावली पहाड़ी’ माना जाएगा। इससे कम ऊंचाई वाले टीलों या पहाड़ों को अब अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा।
जयराम रमेश का ‘FSI’ आंकड़ों से हमला:
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के भरोसेमंद आंकड़ों का हवाला देते हुए चौंकाने वाले तथ्य रखे:
- केवल 8.7% हिस्सा सुरक्षित: उन्होंने बताया कि 20 मीटर से ऊंची पहाड़ियों में से केवल 8.7% ही ऐसी हैं जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा है।
- 90% क्षेत्रफल पर खतरा: नई परिभाषा के लागू होने का मतलब है कि क्षेत्रफल के हिसाब से 90% से ज्यादा अरावली को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी।
- माफियाओं का कब्जा: जयराम रमेश के अनुसार, इन पहाड़ियों को अब माइनिंग (खनन), रियल एस्टेट और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए खोला जा सकता है, जो पहले से ही बीमार इकोसिस्टम को पूरी तरह खत्म कर देगा।
ग्लोबल बातें बनाम लोकल काम:
प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए जयराम रमेश ने कहा कि पर्यावरण को लेकर पीएम की ‘ग्लोबल बातों’ और उनके ‘लोकल कामों’ में जमीन-आसमान का फर्क है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह फैसला पारिस्थितिक रूप से ‘विनाशकारी’ साबित होगा।
PNN24 न्यूज़ फैक्ट चेक: अरावली का नया गणित
| विवरण | पुरानी स्थिति | नई परिभाषा (100 मीटर नियम) |
| संरक्षण का दायरा | लगभग पूरी पर्वत श्रृंखला | मात्र 8.7% से 10% हिस्सा |
| मुख्य खतरा | अवैध माइनिंग | कानूनी माइनिंग और रियल एस्टेट |
| पर्यावरणीय प्रभाव | रेगिस्तान को रोकने वाली दीवार | दीवार कमजोर होगी, दिल्ली-NCR में गर्मी बढ़ेगी |










