ऐतिहासिक फ़ैसला! कर्नाटक में ‘हेट स्पीच और हेट क्राइम’ रोकने के लिए कानून को मंज़ूरी, अपराधियों को 7 साल तक की सज़ा का प्रस्ताव

सारा अंसारी

PNN24 न्यूज़, बेंगलुरु (कर्नाटक)। देश में पहली बार किसी राज्य सरकार के कैबिनेट ने हेट स्पीच (Hate Speech)’ और हेट क्राइम (Hate Crime)’ की रोकथाम के लिए एक विशेष विधेयक को मंज़ूरी दी है। कर्नाटक कैबिनेट ने गुरुवार को इस ऐतिहासिक विधेयक को हरी झंडी दे दी, जिसे अब 8 दिसंबर से बेलगावी में शुरू होने वाले विधानमंडल के शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की संभावना है।

यह विधेयक ऐसे समय में आया है जब पूरे देश में नफ़रत भरे बयानों और अपराधों से निपटने के लिए एक अलग और कठोर कानून की मांग लंबे समय से की जा रही थी।

हेट स्पीच और क्राइम पर सज़ा का प्रस्ताव

प्रस्तावित विधेयक में नफ़रत फैलाने वाले अपराधों को रोकने के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है:

अपराध कारावास जुर्माना
हेट स्पीच (पहली बार) 1 से 7 साल तक 50,000
हेट क्राइम (न्यूनतम) 1 साल 50,000
बार-बार अपराध 2 से 10 साल तक 1 लाख
  • संज्ञेय और गैर-जमानती: इस विधेयक के तहत किए गए अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) होंगे, यानी पुलिस बिना वारंट के गिरफ़्तार कर सकेगी।

क्या होगा हेट स्पीच और हेट क्राइम?

विधेयक में इन अपराधों की व्यापक परिभाषा दी गई है:

  1. हेट स्पीच: कोई भी अभिव्यक्ति (बोलकर, लिखकर, संकेतों से, तस्वीरों से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समूह, वर्ग या समुदाय के खिलाफ चोट पहुँचाना, अशांति फैलाना या दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना पैदा करना हो, वह हेट स्पीच कहलाएगी। यह तब भी हेट स्पीच माना जाएगा, जब यह अभिव्यक्ति धर्म, जाति, समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, विकलांगता या जनजाति से जुड़ी पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देती हो।
  2. हेट क्राइम: ऐसा कोई भी काम जिसमें हेट स्पीच का प्रचार, प्रसार, उकसाना या इसकी कोशिश करना शामिल हो और जिससे किसी व्यक्ति, समूह या संगठन के खिलाफ नफरत या अशांति पैदा हो, वह हेट क्राइम के दायरे में आएगा।

मौजूदा कानून और विवाद

फिलहाल भारत में हेट स्पीच और हेट क्राइम के लिए अलग से कोई केंद्रीय कानून नहीं है। अभी भारतीय नागरिक संहिता (बीएनएस) के प्रावधान लागू होते हैं, जैसे: धारा 196 (दुश्मनी फैलाना), धारा 298 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) और धारा 353 (डर या अशांति फैलाने वाला कंटेंट)।

  • कानूनी आधार: कर्नाटक का यह बिल काफी हद तक आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा द्वारा 2022 में पेश किए गए बिल से प्रेरित है, जो संसद में पास नहीं हो पाया था।
  • विवाद और चिंताएं: गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने स्पष्ट किया है कि यह कानून विपक्षी पार्टियों को निशाना बनाने के लिए नहीं है। हालाँकि, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों को इस कानून के दुरुपयोग की आशंका है। वकील विनय श्रीनिवास ने चिंता जताई कि यह कानून सत्ता बदलने के बाद गलत तरीके से इस्तेमाल होने की आशंका है।”

कानून के समर्थक इसे सामाजिक सद्भाव के लिए ज़रूरी बता रहे हैं, वहीं आलोचक इसे राजनीतिक हथियार बनने की आशंका जता रहे हैं। अब देखना होगा कि विधानमंडल में यह विधेयक क्या रूप लेता है।

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