संपादकीय विश्लेषण: गरिमा का चीरहरण या ‘माई-बाप’ का स्नेह? नीतीश कुमार की ‘हिजाब हरकत’ और समाज की मानसिक सेहत पर उठते गंभीर सवाल

तारिक आज़मी
PNN24 न्यूज़, विशेष रिपोर्ट। पिछले हफ्ते बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक सार्वजनिक मंच पर महिला डॉक्टर का हिजाब खींचने की घटना केवल एक ‘भूल’ नहीं, बल्कि सत्ता, गरिमा और समाज की बदलती मानसिक बुनावट का एक भयावह चेहरा पेश करती है। इस घटना ने न केवल बिहार की राजनीति को शर्मसार किया है, बल्कि व्यक्ति की स्वायत्तता (Autonomy) पर भी गहरी बहस छेड़ दी है।
‘माई-बाप’ संस्कृति और गरिमा का अंत
आजकल सरकारी नौकरियों का वितरण किसी ‘प्रसाद’ की तरह किया जा रहा है, जहाँ जनता को ‘रियाया’ और शासक को ‘माता-पिता’ का दर्जा दे दिया गया है।
- अधिकार बनाम उपकार: जब शासक खुद को ‘अन्नदाता’ समझने लगता है, तो वह यह भूल जाता है कि सामने खड़ा व्यक्ति एक स्वतंत्र नागरिक है।
- गरिमा का हनन: जिस तरह भारतीय समाज में बच्चों की मर्ज़ी के बिना उन्हें भींचना या चूमना सामान्य माना जाता है, वैसी ही ‘पितृसत्तात्मक अभद्रता’ नीतीश कुमार के व्यवहार में दिखी। उन्होंने मान लिया कि ‘हितैषी’ होने के नाते उन्हें किसी महिला की वैयक्तिकता (Individuality) के उल्लंघन का हक है।
क्या ‘मानसिक विक्षिप्तता’ एक बचाव है?
इस घटना ने एक बार फिर मुख्यमंत्री के मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठाए हैं।
- असंतुलित व्यवहार: रिपोर्ट्स और पुलिस गलियारों की चर्चाएं बताती हैं कि नीतीश कुमार का अपनी शारीरिक हरकतों पर नियंत्रण कम होता जा रहा है।
- गंभीर सवाल: यदि कोई व्यक्ति मानसिक तौर पर अस्वस्थ है, तो क्या उसे एक पूरे राज्य की बागडोर सौंपी जानी चाहिए? सहानुभूति अपनी जगह है, लेकिन एक ‘अस्वस्थ’ मस्तिष्क नीति-निर्माण के लिए घातक हो सकता है।
‘सुधारवाद’ का पाखंड और ईरान का हवाला
सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग इस हरकत को ‘मुस्लिम महिला मुक्ति’ के चश्मे से देख रहा है।
- ईरान से तुलना: नीतीश के बचाव में लोग ईरान की महिलाओं के हिजाब विरोधी आंदोलन का हवाला दे रहे हैं। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि ईरान में महिलाएं ‘अपनी मर्ज़ी’ के लिए लड़ रही थीं।
- दोहरा मापदंड: यहाँ महिला की मर्ज़ी हिजाब पहनने की थी। मुख्यमंत्री ने उसकी मर्ज़ी के खिलाफ उसका हिजाब खींचा। यह ‘मुक्ति’ नहीं, बल्कि ‘उत्पीड़न’ है।
- चुनिंदा सुधारवाद: यह कैसा सुधारवाद है जो केवल दूसरे धर्म की महिलाओं के अपमान में सुख ढूँढता है?
संस्थागत चुप्पी और समाज की बीमारी
इस पूरी घटना पर सबसे दुखद पहलू सत्ता और मुख्यधारा की संस्थाओं का मौन है:
- जेडीयू-बीजेपी का बचाव: मंत्रियों और प्रवक्ताओं का यह कहना कि ‘नीतीश बुजुर्ग हैं’ या ‘उन्होंने मुसलमानों के लिए बहुत काम किया है’, उस महिला डॉक्टर के अपमान को कम नहीं करता।
- मीडिया का मौन: बड़े अखबारों के संपादकीय पन्नों से इस अभद्रता की आलोचना का गायब होना हमारी लोकतांत्रिक चेतना के गिरते स्तर का प्रमाण है।
- डॉक्टर का पलायन: अपमान से आहत डॉ. नुसरत परवीन का नौकरी छोड़कर बिहार से चले जाना यह बताता है कि ‘सुशासन’ के दावों के बीच एक पेशेवर महिला खुद को कितना असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रही है।
निष्कर्ष
नीतीश कुमार की हरकत ने न केवल उनके अपने मानसिक संतुलन की स्थिति को उजागर किया है, बल्कि हिंदू समाज के एक हिस्से में बढ़ती ‘सुधारवादी विकृति’ को भी नंगा कर दिया है। यह समय केवल एक नेता की आलोचना का नहीं, बल्कि समाज के रूप में अपनी ‘दिमाग़ी सेहत’ की जांच करने का है।











