उन्नाव कांड: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला— कुलदीप सेंगर की जमानत पर लगी रोक; ‘जेल’ में ही रहेगा दोषी पूर्व BJP विधायक

तारिक खान
नई दिल्ली: उन्नाव बलात्कार मामले के दोषी पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है, जिसके तहत सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर उन्हें जमानत दी गई थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सेंगर जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे।

“इस मामले में हालात अलग हैं। प्रतिवादी (सेंगर) को धारा 304-II (गैर-इरादतन हत्या) के तहत भी सजा सुनाई गई है, जो पीड़िता के पिता की मौत से जुड़ा मामला है। इन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए हम हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हैं।”
सर्वाइवर की बड़ी जीत: सेंगर को जमानत मिलने के बाद से ही रेप सर्वाइवर, उनकी माँ और सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे। इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर दिए गए धरने में सर्वाइवर ने आरोप लगाया था कि 2027 के यूपी चुनाव को देखते हुए सेंगर को राहत दी गई है। सर्वाइवर ने अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई थी, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है।
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल: बता दें कि 23 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर को 15 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दी थी। हाई कोर्ट का तर्क था कि सेंगर 6 साल से जेल में है और अपील के निपटारे में समय लग सकता है। लेकिन CBI ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहाँ शीर्ष अदालत ने पीड़िता के पिता की हत्या वाले केस का हवाला देते हुए जमानत को फिलहाल स्थगित कर दिया।
पृष्ठभूमि:
- 2019: ट्रायल कोर्ट ने सेंगर को नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई।
- 23 दिसंबर 2025: दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा निलंबित की।
- 29 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई।
फैसले के 3 मुख्य संदेश
- न्यायपालिका की सर्वोच्चता: तकनीकी पेंच से ऊपर उठकर कोर्ट ने पीड़िता की सुरक्षा और अपराध की जघन्यता को प्राथमिकता दी।
- सेंगर की बढ़ी मुश्किलें: अब सेंगर को सुप्रीम कोर्ट में अपनी बेगुनाही और जमानत की पात्रता साबित करने के लिए कड़ी कानूनी मशक्कत करनी होगी।
- आंदोलन का असर: इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच इस फैसले को जनता की भावनाओं और न्याय की जीत के रूप में देखा जा रहा है।










