‘लोक सेवक’ की परिभाषा ने बदली कुलदीप सेंगर की किस्मत? समझें वह कानूनी पेंच जिसके आधार पर हाई कोर्ट ने दी जमानत

आफताब फारुकी

नई दिल्ली: उन्नाव बलात्कार मामले में कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत ने कई कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या एक विधायक (MLA) को ‘लोक सेवक’ (Public Servant) माना जा सकता है? इसी तकनीकी पहलू ने इस हाई-प्रोफाइल केस के रुख को मोड़ दिया है।

ट्रायल कोर्ट बनाम हाई कोर्ट: क्या था विवाद? दिसंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने सेंगर को आईपीसी और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने उन्हें एक ‘लोक सेवक’ मानते हुए कड़ी सजा दी थी, क्योंकि कानून के मुताबिक अगर कोई सरकारी पद पर बैठा व्यक्ति (लोक सेवक) बलात्कार जैसा अपराध करता है, तो सजा अधिक गंभीर होती है।

  • निचली अदालत का तर्क: ट्रायल कोर्ट ने 1997 के एक फैसले का हवाला दिया था, जिसमें ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ के तहत विधायक को लोक सेवक माना गया था।
  • हाई कोर्ट का रुख: दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर के वकीलों की इस दलील से सहमति जताई कि पॉक्सो और आईपीसी के मामलों में ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ वाली परिभाषा लागू नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, विधायक आईपीसी के तहत लोक सेवक नहीं माना जाएगा।

सजा की अवधि और जमानत का आधार जमानत देते वक्त हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी देखा:

  1. न्यूनतम सजा: पॉक्सो के तहत बलात्कार के लिए न्यूनतम सजा 7 साल तय है।
  2. काटी गई सजा: कुलदीप सेंगर पहले ही 7 साल 5 महीने जेल में बिता चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि चूंकि सजा की न्यूनतम अवधि पूरी हो चुकी है और ‘लोक सेवक’ होने का मुद्दा अभी अपील के दौरान तय होना बाकी है, इसलिए सजा को निलंबित किया जाना चाहिए।

लोक सेवक होने से क्या बदल जाता है? भारतीय कानून (2017 के नियमों के अनुसार) में सजा के दो अलग-अलग पैमाने हैं:

  • आम नागरिक: बलात्कार के दोषी पाए जाने पर कम से कम 7 साल की सजा।
  • लोक सेवक (Public Servant): यदि कोई लोक सेवक (जैसे पुलिस, अधिकारी या विधायक) दोषी हो, तो कम से कम 10 साल की सजा, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।

हालांकि सर्वाइवर के वकीलों ने तर्क दिया कि सेंगर ने अपने राजनीतिक प्रभाव का गलत इस्तेमाल किया और जांच को प्रभावित किया, लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि ‘सजा के निलंबन’ पर फैसला करते समय वे केवल कानूनी तकनीकी बिंदुओं पर गौर कर सकते हैं। अब इस मामले की पूरी सुनवाई अपील के दौरान होगी, जहाँ यह अंतिम रूप से तय होगा कि विधायक को लोक सेवक माना जाए या नहीं।

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि 2017 (जब उन्नाव की घटना हुई थी) के नियमों के अनुसार, एक सामान्य नागरिक और एक लोक सेवक के लिए सजा के प्रावधानों में क्या अंतर था:

विवरण आम नागरिक (Ordinary Citizen) लोक सेवक (Public Servant)
कानूनी धारा IPC की धारा 376 IPC 376(2)(b) और POCSO 5(c)
न्यूनतम सजा 07 साल का कारावास 10 साल का कारावास
अधिकतम सजा आजीवन कारावास कठोर आजीवन कारावास (पूरी प्राकृतिक उम्र तक)
जुर्माना न्यायालय के विवेक पर न्यायालय के विवेक पर (अक्सर अधिक गंभीर)
कुलदीप सेंगर का मामला ट्रायल कोर्ट ने ‘लोक सेवक’ मानकर उम्रकैद दी थी।

मुख्य कानूनी पेंच (Key Legal Point)

दिल्ली हाई कोर्ट का वर्तमान रुख: कोर्ट ने प्रथम दृष्ट्या माना है कि आईपीसी और पॉक्सो के तहत एक विधायक (MLA) को ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। चूंकि कुलदीप सेंगर पहले ही 7 साल 5 महीने की जेल काट चुके हैं (जो कि एक आम नागरिक के लिए निर्धारित न्यूनतम 7 साल से अधिक है), इसलिए उन्हें अपील लंबित रहने तक जमानत दी गई है।

हमारी निष्पक्ष पत्रकारिता को कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त रखने के लिए आप आर्थिक सहयोग यदि करना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें


Welcome to the emerging digital Banaras First : Omni Chanel-E Commerce Sale पापा हैं तो होइए जायेगा..

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *