‘वंदे मातरम्’ पर सियासी घमासान: 150 साल पूरे होने पर संसद से सड़क तक तीखी बहस

शफी उस्मानी

नई दिल्ली/लखनऊ: देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा शुरू होने के साथ ही, यह मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति में गरमाहट पैदा कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में चर्चा की शुरुआत करते हुए जहाँ इस गीत के ऐतिहासिक गौरव को पुनःस्थापित करने की बात कही, वहीं कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने बीजेपी पर इसे जबरन थोपने और राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है।

पीएम मोदी ने ‘वंदे मातरम्’ के गौरव को किया याद

सोमवार को लोकसभा में चर्चा शुरू करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने वंदे मातरम् के सफर को देश की चुनौतियों से जोड़ा।

  • चुनौतीपूर्ण कालखंड: पीएम मोदी ने कहा, “जब वंदे मातरम् के पचास वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था। जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था।”
  • पुनःस्थापना का अवसर: उन्होंने इसे महान अध्याय बताते हुए कहा कि इसके 150 वर्ष उस गौरव को पुनःस्थापित करने का अवसर है।
  • 1857 से जुड़ाव: पीएम ने ज़ोर दिया कि यह गीत ऐसे समय पर लिखा गया जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ सल्तनत बौखलाई हुई थी और भारतीयों पर जुल्म कर रही थी। यह गीत उस दबाव के ख़िलाफ़ शक्ति का प्रतीक बना।

बीजेपी बनाम कांग्रेस: इतिहास को लेकर तकरार

‘वंदे मातरम्’ को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद इस चर्चा के साथ ही और गहरा गया है। दोनों पक्षों ने इतिहास के पन्नों से तर्क जुटाए हैं:

  • बीजेपी का आरोप: बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस ने 1937 के फ़ैज़ाबाद अधिवेशन से पहले वंदे मातरम्के कुछ अहम हिस्सों को हटा दिया था। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं आरोप लगाया था कि, “वंदे मातरम् को तोड़ दिया गया था। ये अन्याय क्यों किया गया। इसी ने विभाजन के बीज बोए।” बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने यह भी कहा कि नेहरू जी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर ‘सहज नहीं थे’।
  • कांग्रेस का पलटवार: कांग्रेस प्रवक्ता जयराम नरेश ने इन आरोपों को निराधार बताया। उन्होंने इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य की किताब का ज़िक्र करते हुए कहा कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 1937 में नेहरू को पत्र लिखकर खुद पहले दो स्टैंजा (हिस्सों) को अपनाने का सुझाव दिया था, क्योंकि वह स्वयं इस गीत से जुड़े थे। उन्होंने तंज़ कसते हुए कहा कि पीएम मोदी अब गुरुदेव टैगोर पर विभाजनकारी विचारधारा रखने का आरोप लगा रहे हैं।

शिक्षा संस्थानों में अनिवार्य करने की माँग पर विवाद

संसद से बाहर, शैक्षणिक संस्थानों में ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य किए जाने की बीजेपी नेताओं की माँग पर भी राजनीतिक उबाल है।

  • योगी आदित्यनाथ का रुख: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ़ ऐलान किया है कि उनकी सरकार राज्य के स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षा संस्थाओं में इसे गाना अनिवार्य कर देगी। उन्होंने बाराबंकी में कहा, जो भी वंदे मातरम् का विरोध कर रहा है, वह भारत माता का विरोध कर रहा है।”
  • सपा का विरोध: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, मुख्यमंत्री जी की कुर्सी जब हिलने लगती है तो वो साम्प्रदायिक हो जाते हैं।” उन्होंने तर्क दिया कि अगर इसे अनिवार्य करना होता, तो संविधान निर्माताओं ने तभी क्यों नहीं किया? उन्होंने इसे लोगों की चॉइस पर छोड़ा था।
  • मुस्लिम नेताओं की आपत्ति: संभल से सपा सांसद ज़ियाउर्रहमान बर्क और विधायक इक़बाल महमूद ने भी अनिवार्य किए जाने पर ऐतराज़ जताया है। उनका कहना है कि संविधान ने सभी को स्वतंत्रता दे रखी है, और किसी को यह गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

गीत का इतिहास

यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में बांग्ला और संस्कृत भाषा में लिखा था। बाद में उन्होंने इसे अपनी प्रसिद्ध कृति आनंदमठ‘ (1885) में जोड़ दिया। इस गीत को लोकप्रिय बनाने और उसे धुन देने का श्रेय रबीन्द्रनाथ टैगोर को जाता है, जिन्होंने इसे कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया था।

संसद के दोनों सदनों में होने वाली इस बहस से यह साफ़ है कि ‘वंदे मातरम्’ आज भी देश की राजनीति और राष्ट्रीय पहचान की बहस के केंद्र में है।

हमारी निष्पक्ष पत्रकारिता को कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त रखने के लिए आप आर्थिक सहयोग यदि करना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें


Welcome to the emerging digital Banaras First : Omni Chanel-E Commerce Sale पापा हैं तो होइए जायेगा..

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *