जय हो नगर निगम वाराणसी: फोटो देख ले साहब…! बेनिया पार्क बन गया है मिनी शापिंग माल, मन माना घर जाना जैसे ठेकेदार बन बैठा पार्क का मालिक, नगर आयुक्त साहब ‘ठेकेदार कैसे किसी को ठेका दे सकता है…?’

तारिक आज़मी

वाराणसी: शहर बनारस के दिल में स्थित राज नारायण पार्क जिसको बेनिया पार्क के नाम से पुकारा जाता के सुन्दरीकरण के लिए करोडो खर्च हो गए। पार्क खुबसूरत बनकर तैयार हुआ। बच्चे के प्ले ग्राउंड की व्यवस्था के साथ बेसमेंट पार्किंग की भी शानदार व्यवस्था के साथ साथ इस पार्क की देख रेख करने के लिए स्मार्ट सिटी के हवाले किया गया।

पार्किंग के लिए वाहनों का शुल्क निर्धारित किया गया और पार्क में बच्चो के खेलने वाले सभी प्रकार के आधुनिक उपकरण उपलब्ध हुवे। पार्क में इंट्री फीस 10 रुपये निर्धारित किया गया और इसके अलावा अन्य खिलौनों और झूलो के साथ होने वाले मनोरंजन हेतु अन्य चार्ज अलग से थे। समय बीता और पार्क की चर्चा दूर दराज़ तक होने लगी।

समय के साथ इसका ठेका ख़त्म हुआ और फिर कागजों पर सरकारी घुड़दौड़ शुरू हुई। बड़े बड़े टेंडर आमंत्रित किये गए और कथित रूप से टेंडर खोले गए तथा सबसे अधिक बोली वाला टेंडर पास हो गया। इस मामले में कई अनियमितता का आरोप लगा, मगर आज हम उस अनियमितता की बात नहीं कर रहे है। बल्कि इस सुन्दर पार्क को अपने मुनाफाखोरी के चक्कर में ठेकेदार द्वारा एक शापिंग माल के रूप में तब्दील कर दिए जाने की बात कर सकते है।

सर्दियों में तिब्बती मार्किट लगाने के लिए एक अलग जगह निर्धारित रहती है। जिसका टेंडर सम्बंधित विभाग करता है। मगर पुरे पार्क और पार्किंग के लिए ठेकेदार को ही पार्क का मालिक बना दिया गया है। पटाखा मार्किट लगाया जाना है तो 9 लाख से लेकर 15 लाख तक का ठेका खुद ठेकेदार देकर एक मोटी रकम उठा लेता है और बच्चो के लिए निःशुल्क फ़ुटबाल खेलने की जगह पर पटाखा मार्किट लग जाती है।

अब तो हद नवनियुक्त ठेकेदार तिवारी जी ने ख़त्म कर दिया है। तिवारी जी ने एक मोटी रकम लेकर फ़ुटबाल हेतु अरक्षित जगह के साथ पार्किंग को जाने वाले मार्ग तक पर टीन शेड की दुकानों को लगवा कर सर्दी के कपड़ो की पूरी मार्किट पार्क को बना दिया है। पार्किंग मार्ग पर बनी ये मार्किट कभी बड़ी दुर्घटना का कारण बनेगी तो नगर निगम पल्ला झाड कर किनारे हो जायेगा, इसमें कोई दो या तीन राय तो हो ही नहीं सकती है। मगर मुनाफा मोटा ठेकेदार के तिजोरी में जा रहा है।

हद ख़त्म है कि एक मोटी रकम लेकर पार्किंग के गेट से पहले बने खुले एरिया में अस्थाई दूकान बनवा कर ठेकेदार ने ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’ निकाल लिए। जब ठेकेदार खुद अपनी तिजोरी भर रहा है तो उसके गेट पर बैठे कर्मचारी जो पार्किंग कर्मी कम और गुंडा ज्यादा लगते है काहे पीछे रहेगे। उन्होंने भी अपनी सेटिंग कर रखा है। होटल के दलाल से लेकर मंदिर में दर्शन करवाने के दावे करने वाले दलाल भी इसी पार्किंग गेट पर सक्रिय हो गए है। सूत्रों की माने तो इन दलालों के द्वारा पार्किंग कर्मियों को एक रकम सुविधा शुल्क के नाम पर दिया जाता है।

हद इसके आगे भी देखना है तो आप जानकार और भी अचंभित हो जायेगे कि कुछ रिक्शेवालो से रोज़ही लिया जाता है और वह पार्किंग के अन्दर जाकर सवारी बैठा कर उनको दर्शन करवाने और होटल दिलवाने के नाम पर अपनी पत्ती सेट करते रहते है। हालत को आप सिर्फ पार्किंग में ही नहीं बल्कि बेनिया तिराहे तक देख सकते है। मगर नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की आँख बंद है। बंद भी क्यों न हो? जब खूब महंगा ठेका दे डाला जायेगा तो फिर ठेकेदार पैसे वसूल कैसे करेगा।

ये तो रही पार्किंग की बात, अब आ जाइये आप पार्क के जानिब। इसके पहले के ठेकेदार द्वारा सिर्फ प्रमाणित दुकानदारो को दुकाने आवंटित करके खाने पीने की चीज़े बेचीं जाती थी। मगर अब तो हाल ऐसा हो गया है कि 200 रुपये देकर कोई भी अपना खोमचा भले उसमे वह सदा गला सामान बेच रहा हो लेकर पार्क के अन्दर दुकानदारी कर सकता है। लोग मरते है तो मर जाए मगर ठेकेदार को तो सिर्फ पैसे चाहिए।

सूत्र बताते है कि ठेकेदार के कर्मियों द्वारा अक्सर ही आम नागरिको से अभद्रता और दुर्व्यवहार किया जाता है। कई बार स्थिति बिगड़ भी जाती है। मगर मामले को स्थानीय पुलिस द्वारा ठंडा कर दिया जाता है। हमने पार्किंग स्थल पर लगी दुकानों के सम्बन्ध में ठेकेदार के एक कर्मी से सवाल पूछा तो उसका जवाब था कि 31 लाख का ठेका लिया है तो पैसे कैसे सुल होंगे। स्मार्ट सिटी ने हमको अधिकार दिया है कि बकिया ठेके हम सब दे सकते है। तो नगर आयुक्त साहब ‘बेनिया के इस ठेके के लिए जो नायाब हीरा आप तलाश कर लाये है, वह हीरा अब गले में अटक रहा है। कुछ करे हुजुर वर्ना ठेकेदार कही बेनिया में 2-4 फ़्लैट बना कर न बेच डाले।’

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