क्या सजा मिलने के बाद भी मिल सकती है जमानत? समझें क्या है ‘सजा का निलंबन’ और सुप्रीम कोर्ट की इस पर क्या है राय

आदिल अहमद
नई दिल्ली: हाल ही में उन्नाव कांड के दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित कर उसे जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले ने एक नई बहस छेड़ दी है। कई लोग हैरान हैं कि जिसे उम्रकैद की सजा मिली हो, वह जेल से बाहर कैसे आ सकता है? दरअसल, यह कानून की उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे ‘सजा का निलंबन’ (Suspension of Sentence) कहा जाता है। आइए, PNN24 News के इस विशेष लेख में आसान भाषा में समझते हैं इसके कानूनी पहलू।

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अपील की सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट के पास यह शक्ति होती है कि वह सजा को अस्थायी रूप से ‘निलंबित’ कर दे और अभियुक्त को जमानत पर रिहा कर दे।
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ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि अपील की प्रक्रिया पूरी होने में कई साल लग सकते हैं, और यदि अंत में व्यक्ति निर्दोष पाया गया, तो जेल में बिताया गया उसका समय वापस नहीं लाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसले और दिशा-निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने कई फैसलों (विशेषकर 2023 के एक फैसले) में स्पष्ट किया है कि उम्रकैद की सजा पाए व्यक्ति को भी जमानत मिलने का अधिकार होना चाहिए। इसके लिए कोर्ट ने कुछ शर्तें तय की हैं:
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बरी होने की उम्मीद: हाई कोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करने पर अभियुक्त के बरी होने की कोई संभावना (Prima Facie Case) है?
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बड़ी गलती की पहचान: यदि हाई कोर्ट को प्रथम दृष्ट्या निचली अदालत के फैसले में कोई बड़ी कानूनी चूक या गलती नजर आती है, तो दोषी को जमानत दी जानी चाहिए।
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लंबा वक्त: सुनवाई खत्म होने तक किसी को जेल में रखना उचित नहीं है, यदि कोर्ट को लगता है कि सजा पर दोबारा विचार करने की ठोस वजहें मौजूद हैं।
लेकिन छोटी गलतियों पर राहत नहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि कानून का यह फायदा हर किसी को नहीं मिलना चाहिए। केवल मामूली तकनीकी गलतियों के आधार पर किसी गंभीर अपराधी की सजा को निलंबित नहीं किया जाना चाहिए। राहत तभी दी जाती है जब न्याय की बुनियादी प्रक्रिया में बड़ी त्रुटि दिखाई दे।











