‘स्कूल’ था या ‘मदरसा’? सरपंच की एनओसी और उनके द्वारा अधिकारियो के सामने हाथ जोड़ने के बावजूद 48 घंटे में जमींदोज हुई इमारत, महज़ 3 मुस्लिम परिवार वाले आदिवासी बाहुल्य गाँव मे ‘अब्दुल’ द्वारा स्कूल बनाने का सपना टुटा

तारिक आज़मी 

बैतूल (मध्य प्रदेश): “मैं बहुत डरा हुआ हूं, जो लोग स्कूल गिरा सकते हैं, वे मेरा क्या हश्र करेंगे?” यह शब्द उस अब्दुल नईम के हैं, जिसने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी और उधार के 20 लाख रुपये लगाकर बैतूल के धाबा गांव में एक प्राइवेट स्कूल की नींव रखी थी। लेकिन प्रशासन ने इस निर्माणाधीन स्कूल को ‘मदरसा’ करार देते हुए बुलडोजर से ढहा दिया। अब वहां स्कूल की जगह सिर्फ मलबे का ढेर और टूटी कुर्सियां बची हैं।

आदिवासी गांव, एक सपना और अचानक कार्रवाई धाबा गांव एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहाँ बच्चों को पढ़ने के लिए 15 किमी दूर जाना पड़ता है। नईम ने सोचा था कि गांव में स्कूल खुलने से सहूलियत होगी। उन्होंने जमीन खरीदी, डायवर्जन कराया और 30 दिसंबर 2025 को शिक्षा विभाग में आवेदन भी किया। लेकिन 10 जनवरी को अचानक अधिकारियों का दल पहुँचता है और खेल शुरू होता है।

नोटिस का खेल और विरोधाभासी दावे

  • 11 जनवरी: नईम को शाम 7 बजे नोटिस मिलता है कि निर्माण अवैध है, इसे खुद गिरा दें।
  • 12 जनवरी: सरपंच रामरती ने स्कूल के लिए NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) दे दी।
  • 13 जनवरी: नईम अपनी गुहार लेकर जिला मुख्यालय पहुंचे, लेकिन उनके लौटने से पहले ही प्रशासन ने बुलडोजर चलवा दिया।

कलेक्टर और पंचायत के बीच ‘जिम्मेदारी’ का फुटबॉल मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू जिला प्रशासन का रवैया है। जिलाधिकारी नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने PNN24 News को दिए संदर्भों में कहा:

“कार्रवाई पंचायत ने की है। मेरे पास इसे रोकने की शक्ति नहीं है। हालांकि मेरी नजर में कार्रवाई लीगल थी, फिर भी मैं जांच कर रहा हूं।”

वहीं, गांव के सरपंच और उप-सरपंच संदीप उइके साफ़ कहते हैं कि उन पर प्रशासन की ओर से मौखिक दबाव था। ग्रामीणों के पास मौजूद वीडियो में देखा जा सकता है कि खुद सरपंच और ग्रामीण बुलडोजर के सामने खड़े होकर कार्रवाई रोकने की भीख मांग रहे थे, लेकिन अधिकारियों ने एक न सुनी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी भी ढांचे को गिराने से पहले पर्याप्त समय और सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। नईम के मामले में नोटिस और कार्रवाई के बीच 48 घंटे का समय भी नहीं दिया गया।

भरोसा भी टूटा… गांव के कपिल कावड़े कहते हैं, “यहाँ सिर्फ इमारत नहीं टूटी, प्रशासन पर से हमारा भरोसा भी टूट गया है।” मलबे के बीच खड़ी एक अधूरी दीवार अब सवाल पूछ रही है कि क्या बच्चों की शिक्षा से ज्यादा जरूरी ‘बुलडोजर की सियासत’ है?

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