‘धान का कटोरा’ के बाद अब जम्मू-कश्मीर में ‘शिक्षा की सियासत’: कश्मीर में प्रस्तावित लॉ यूनिवर्सिटी को जम्मू लाने की मांग पर अड़ी बीजेपी; सीएम उमर बोले— “फैसले से पहले ही भेदभाव के आरोप?”

फारुख हुसैन
डेस्क: जम्मू-कश्मीर में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) की स्थापना को लेकर एक बार फिर जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच ‘क्षेत्रीय असंतुलन’ की बहस छिड़ गई है। कटरा के मेडिकल इंस्टीट्यूट (SMVDIME) का पंजीकरण रद्द होने के बाद उत्साहित बीजेपी और सहयोगी दलों ने अब आगामी लॉ यूनिवर्सिटी को कश्मीर के बडगाम से जम्मू स्थानांतरित करने के लिए मोर्चा खोल दिया है।

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दलील: बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के. निर्मल किशोर कोटवाल का कहना है कि कश्मीर में यूनिवर्सिटी होने से देश के अन्य हिस्सों के छात्रों को रसद, खराब मौसम और पहुंच संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने इसे जम्मू के साथ ‘क्षेत्रीय न्याय’ से जोड़ा है।
मुख्यमंत्री का पलटवार: “आईआईटी-आईआईएम के वक्त कहां था संतुलन?” मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस मांग को खारिज करते हुए विपक्षी दलों के दोहरेपन पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 2015-18 के दौरान जब जम्मू को आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) जैसे दो बड़े संस्थान मिले थे, तब किसी ने क्षेत्रीय संतुलन की मांग नहीं की थी। हालांकि, बढ़ते दबाव के बीच सीएम ने थोड़ा नरम रुख अपनाते हुए कहा:
“अभी तक अंतिम स्थान पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। निर्णय लेने से पहले ही भेदभाव के आरोप लगाए जा रहे हैं। हम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य हितधारकों से सलाह के बाद ही फैसला लेंगे।”
बडगाम बनाम जम्मू: सियासी पारा हाई: मालूम हो कि सदन में पहले ही श्रीनगर में एनएलयू की स्थापना के लिए प्रस्ताव पारित किया जा चुका है और इसके लिए फंड भी आवंटित है। सरकार ने बडगाम के ओमपोरा को एक उपयुक्त अस्थायी परिसर के रूप में चिन्हित किया था।
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बीजेपी की चेतावनी: उधमपुर पूर्व से भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने साफ कर दिया है कि अगर यूनिवर्सिटी जम्मू में नहीं खुली, तो उनके नेता सड़कों पर उतरेंगे।
छात्रों का पक्ष: दूसरी ओर, कश्मीरी छात्र नेता मीर मुजीब ने इसे ‘संकीर्ण राजनीति’ करार दिया है। उनका कहना है कि जम्मू पहले से ही सबसे विकसित क्षेत्रों में से एक है और बुनियादी ढांचे के मामले में संपन्न है। ऐसे में खुद को पीड़ित दिखाना तथ्यों के विपरीत है।
यह विवाद केवल एक शैक्षणिक संस्थान का नहीं है, बल्कि जम्मू और कश्मीर के बीच के उस गहरे राजनीतिक विभाजन को दर्शाता है, जिसे भाजपा और क्षेत्रीय दल अपनी-अपनी सुविधानुसार हवा देते रहे हैं। 2 फरवरी से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में यह मुद्दा गरमाना तय है।











