इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोका संभल के तत्कालीन CO अनुज चौधरी पर FIR का आदेश; CJM कोर्ट के फैसले पर लगी रोक, कानूनी दलीलों पर पड़ा पूर्णविराम

प्रयागराज: तत्कालीन संभल सीओ अनुज चौधरी को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी राहत। CJM कोर्ट के FIR दर्ज करने वाले आदेश पर लगाई रोक। कानूनी विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं के बीच छिड़ी बहस पर हाई कोर्ट की मुहर।

शफी उस्मानी

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के चर्चित अधिकारी और तत्कालीन संभल सीओ अनुज चौधरी को एक बड़ी न्यायिक राहत दी है। हाई कोर्ट ने सीजेएम (CJM) कोर्ट के उस आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है, जिसमें अनुज चौधरी और संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।

न्यायिक आदेश और पुलिस महकमे की प्रतिक्रिया हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब अनुज चौधरी और तत्कालीन थाना प्रभारी के विरुद्ध कोई भी आपराधिक कार्रवाई या मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकेगा। पुलिस महकमे में इस आदेश का स्वागत किया गया है। विभाग के अंदर यह चर्चा जोरों पर थी कि सीजेएम कोर्ट का पिछला आदेश तथ्यों के बजाय व्यक्तिगत आधारों से प्रेरित था, जिसे अब उच्च न्यायालय ने सुधार दिया है।

कानूनी विशेषज्ञों में दो फाड़: ‘जज बनाम जज’ की दलीलें यह मामला न केवल प्रशासनिक बल्कि कानूनी गलियारों में भी चर्चा का विषय बना रहा। अधिवक्ताओं के बीच इसे लेकर दो अलग-अलग मत सामने आए थे:

  • पहला मत: कुछ अधिवक्ताओं का तर्क था कि एक जज के आदेश को न्यायिक मर्यादा के तहत रद्द नहीं किया जा सकता।
  • दूसरा मत: कानूनी विशेषज्ञों ने इस दलील को खारिज करते हुए इसे ‘न्यायिक पदानुक्रम’ (Judicial Hierarchy) की गलत व्याख्या बताया। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना था कि हाई कोर्ट को निचली अदालतों के आदेशों की समीक्षा करने और त्रुटिपूर्ण पाए जाने पर उन्हें रद्द करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।

राजनीतिक सुगबुगाहट और न्यायाधीश का चर्चित बयान संभल का यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील माना जा रहा था, जिसके कारण सत्ता और विपक्ष दोनों की नजरें हाई कोर्ट के रुख पर टिकी थीं। इसी बीच हाई कोर्ट के एक जज का वह पुराना बयान भी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि कई बार पुलिस अधिकारी न्यायालयीन प्रक्रिया का शिकार बन जाते हैं या उनके विरुद्ध आदेश जारी करने में प्रक्रियात्मक चूक होती है।

हाई कोर्ट के ताजा आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध किसी भी दंडात्मक आदेश से पहले कानूनी प्रक्रिया और क्षेत्राधिकार का पालन अनिवार्य है।

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