इंसानियत की कोई सरहद नहीं होती: कोटद्वार के ‘दीपक’ ने जलाया उम्मीद का दीया या नफरत की आग?

तारिक आज़मी
डेस्क: 21वीं सदी के भारत में जब हम चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं, तब क्या किसी 75 वर्षीय बुजुर्ग की दुकान का नाम ‘बाबा’ होने पर बवाल खड़ा करना उचित है? कोटद्वार की सड़कों पर जो कुछ भी हुआ, वह केवल एक नाम बदलने का दबाव नहीं था, बल्कि उस सहिष्णुता पर हमला था जिसने सदियों से इस देश को बांधे रखा है।

क्या मदद करना अब अपराध है? बजरंग दल के कार्यकर्ताओं द्वारा दीपक को ‘गद्दार’ कहना और देहरादून से सैकड़ों की भीड़ लेकर उनके जिम पर हमला करना कई सवाल खड़े करता है। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ न्याय और अन्याय के बीच का अंतर केवल ‘नाम’ और ‘मजहब’ तय करेगा? यदि एक हिंदू युवक ने एक मुस्लिम बुजुर्ग की दुकान बचाने की कोशिश की, तो यह ‘गद्दारी’ कैसे हो गई?
प्रशासन की भूमिका पर सवाल दीपक का यह कहना कि “पुलिस से जो उम्मीद थी, वह शून्य दिखी,” चिंताजनक है। जब पुलिस को पहले ही खतरे की आशंका दी गई थी, तो प्रदर्शनकारियों को खुली छूट कैसे मिली? मुख्यमंत्री के दौरे के बीच इस तरह का उन्माद प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है।
उत्तराखंड जिसे ‘देवभूमि’ कहा जाता है, वहां की हवाओं में नफरत का जहर घोलना राज्य की छवि को वैश्विक पटल पर नुकसान पहुँचा रहा है। दीपक कश्यप जैसे युवाओं की आवाज़ को दबाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। आज समाज को तय करना होगा कि वह भीड़तंत्र के साथ खड़ा है या उस अकेले ‘दीपक’ के साथ, जो अँधेरे में भी इंसानियत की लौ जलाए हुए है।











