विद्यापीठ या भ्रष्टाचार का ‘अखाड़ा’? बिना जमीन के चल रहे महादेव पीजी कॉलेज पर मेहरबान यूनिवर्सिटी; फर्जीवाड़े, हत्या और ‘कमीशन’ के खेल का PNN24 पर बड़ा खुलासा…!

वाराणसी: महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ में 'गांधी बाबा' (नोटों) का चमत्कार! बिना जमीन के चल रहे महादेव पीजी कॉलेज पर बड़ा खुलासा। NCTE की रोक और कमिश्नर द्वारा फर्जी CLU निरस्त करने के बाद भी यूनिवर्सिटी मेहरबान। हत्या और भू-माफियाओं के गठजोड़ की इनसाइड स्टोरी।

तारिक आज़मी 

वाराणसी: पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विरासत कहे जाने वाले महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ (MGKVP) की साख आज दांव पर है। विश्वविद्यालय प्रशासन और भू-माफियाओं के बीच ऐसा ‘मधुर’ संबंध उजागर हुआ है, जहाँ नियमों की बलि चढ़ाकर एक फर्जी संस्थान को न केवल ढाल दी जा रही है, बल्कि उसे परीक्षा का नोडल केंद्र बनाकर पुरस्कृत भी किया जा रहा है। मामला बरियासनपुर स्थित महादेव पीजी कॉलेज का है।

बिना जमीन के ‘महल’: 2002 से जारी है धोखाधड़ी PNN24 न्यूज़ की पड़ताल के अनुसार, महादेव पीजी कॉलेज 2002 में बिना किसी वैध भूमि के शुरू हुआ। 2005 में फर्जी दस्तावेजों के सहारे मान्यता के मानक पूरे किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस जमीन पर यह कॉलेज खड़ा है, उस पर हाईकोर्ट का यथास्थिति’ (Stay Order) प्रभावी है। नियमतः स्टे वाली जमीन पर मान्यता स्वतः रद्द होनी चाहिए, लेकिन यहाँ यूनिवर्सिटी की ‘कृपा दृष्टि’ ने सारे नियम बौने कर दिए हैं।

शिकायतकर्ता की ‘मौत’ और फाइलों का दफन होना इस मामले के असली शिकायतकर्ता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है, जिसका हत्या का मामला अदालत में विचाराधीन है। आरोप है कि इस ‘खूनी खेल’ के पीछे भी कॉलेज के हितों को सुरक्षित रखना था। 2019 में तत्कालीन जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट को कुलपति त्रिलोकीनाथ सिंह और रजिस्ट्रार साहब मौर्य ने दबा दिया। इसके बाद आए जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा की कार्यशैली भी इस मामले में संदेह के घेरे में रही।

कमिश्नर ने पकड़ी चोरी: 2024 में निरस्त हुआ फर्जी CLU कॉलेज ने 2008 में एक फर्जी खतौनी और CLU (Land Use Change) तैयार किया था। सरकारी रिकॉर्ड में इस आदेश का कोई अस्तित्व ही नहीं था। जबकि इन गाटो पर फाट बटवारे का मुकदमा 1996 में दर्ज हुआ और 2006 में सभी सह खातेदार का नाम चढ़ा था, जो आज भी यथास्थिति में सरकारी दस्तावेजों में हमको प्राप्त हुआ, मगर महादेव का नाम अचानक ही ज़मीन पर 2005 में चढ़ गया जबकि महादेव पीजी कालेज इस मुक़दमे में पार्टी भी नहीं था। यानि ये नाम महादेव पीजी कालेज के कर्ताधर्ताओ द्वारा फर्जी तरीके से चढ़वाया गया था, जो कोई बड़ी बात नहीं हो सकती है क्योकि जब बलिया जनपद में इसी परिवार का एक सदस्य फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी करते हुवे पकड़ा जा सकता है तो ये कौन सी बड़ी बात थी?

  • कमिश्नर की कार्रवाई: 2024 में वाराणसी कमिश्नर ने इस शिकायत को सही पाया और फर्जी CLU को निरस्त कर दिया।
  • तहसीलदार की संलिप्तता: तहसीलदार और कंप्यूटर प्रभारी की मुहरों का इस्तेमाल कर जिस तरह यह ‘एप्सटीन फाइल’ की तर्ज पर जाल बुना गया, वह बड़े प्रशासनिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।

NCTE की पाबंदी, फिर भी यूनिवर्सिटी का ‘वरदान’ फर्जीवाड़े की पुष्टि होने पर NCTE ने इस कॉलेज में बीएड (B.Ed) दाखिलों पर रोक लगा दी थी और विद्यापीठ को कार्रवाई का निर्देश दिया था। लेकिन कार्रवाई के बजाय यूनिवर्सिटी ने इस कॉलेज को नोडल परीक्षा केंद्र’ बना दिया है। क्या यह “हरे नोटों” (गांधी बाबा) का वजन है या किसी रसूखदार का दबाव? जबकि एक तरफ हमारे सूत्र बताते है कि फर्जी डिग्री के सहारे नौकरी पाए हुवे लोग ही इस महादेव पीजी कालेज के फर्जीवाड़े को सहारा देकर आज भी इसकी मान्यता को बरक़रार रखे है.

PNN24 न्यूज़ का तीखा सवाल:

  • एक ही जमीन के दो मालिक कैसे हो सकते हैं?
  • 2006 के बाद सरकारी रिकॉर्ड से गायब कॉलेज का नाम 2005 में खतौनी में कैसे आया?
  • क्या विश्वविद्यालय प्रशासन अजय सिंह के सामने नतमस्तक है?
  • शासनादेश के दिशा-निर्देशों का उलंघन करने के बावजूद मान्यता रद्द करने में ‘सांप’ क्यों सूंघ गया है?

जम्मू के मेडिकल कॉलेज की तरह क्या यहाँ भी ‘बुलडोजर’ और ‘निरस्तीकरण’ की कार्रवाई होगी, या फिर काशी की इस पावन शिक्षा स्थली को भ्रष्टाचार का केंद्र बने रहने दिया जाएगा?

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