एमपी: 100 रुपये के गेहूं और 45 साल का इंतज़ार! जब 65 साल के ‘दादा’ को जवानी की ‘गलती’ के लिए ले गई पुलिस; व्यवस्था पर उठे सवाल

एमपी: 45 साल पहले '100 रुपये के गेहूं' की चोरी, अब 65 साल के सलीम गिरफ्तार! पुलिस फाइलों के डिजिटलीकरण ने खोला दशकों पुराना राज। पोते-पोतियों के दादा को 'चोर' बताकर ले गई पुलिस। पढ़ें एक हैरान करने वाली कानूनी दास्तां।

तारिक खान

खरगोन (मध्य प्रदेश): कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन ज़िले में यह कहावत कुछ अलग ही अंदाज़ में सच हुई। यहाँ पुलिस ने 65 वर्षीय सलीम मेवाती को एक ऐसी ‘चोरी’ के लिए गिरफ्तार किया, जो उन्होंने 45 साल पहले यानी 1980 में की थी। ज़ुर्म था— 100 रुपये के गेहूं की चोरी।

1980 की वो रात और 2026 की गिरफ्तारी दिसंबर 1980 में, जब सलीम महज़ 19-20 साल के (परिवार के अनुसार किशोरावस्था) थे, उन पर और उनके 6 दोस्तों पर दो खेतों से गेहूं चुराने का आरोप लगा था। माणिकचंद और लालचंद पटेल की शिकायत पर आईपीसी की धारा 379 के तहत मामला दर्ज हुआ। समय बीतता गया, सलीम की शादी हुई, वे दूसरे ज़िले (धार) में जाकर बस गए, उनके बच्चे हुए और अब वे पोते-पोतियों वाले दादा बन चुके हैं। लेकिन पुलिस के रिकॉर्ड में वे आज भी ‘फरार अभियुक्त’ थे।

डिजिटलीकरण ने याद दिलाई ‘जवानी की गलती’ खरगोन पुलिस द्वारा पुराने मामलों के डिजिटलीकरण के दौरान यह फाइल फिर से खुली। सब-डिवीजनल पुलिस ऑफिसर श्वेता शुक्ला के अनुसार, कोर्ट के स्थाई वारंट के आधार पर जब पुलिस ने तलाश शुरू की, तो इत्तेफाक से एक दूसरे अभियुक्त के परिवार से सलीम का सुराग मिल गया। शनिवार को जब पुलिस उनके घर पहुंची, तो परिवार सदमे में आ गया।

परिवार का दर्द: “हम अपराधी नहीं, सामान्य लोग हैं” सलीम की पत्नी तस्लीम और बहू आयशा का कहना है कि वे इस कार्रवाई से स्तब्ध हैं। तस्लीम ने सवाल उठाया:

“अगर पुलिस ने इतने सालों में कभी ढंग से काम किया होता या कोई समन भेजा होता, तो हमें पता चलता। हम कहीं छिपे नहीं थे, पास के ज़िले में ही रह रहे थे। अब जब वे बुजुर्ग हो गए हैं और बीमारी से जूझ रहे हैं, तब उन्हें ‘दुर्दांत अपराधी’ की तरह पेश करना गलत है।”

अंततः ‘राजीनामा’ से सुलझा मामला 7 फरवरी को गिरफ्तारी के बाद सलीम को जेल भेजा गया था। हालांकि, अब इस मामले में मानवीय संवेदनाओं की जीत हुई है। शिकायतकर्ता माणिकचंद पटेल (80 वर्ष) और सलीम मेवाती के बीच समझौता हो गया है। शिकायतकर्ता के बेटे राजेंद्र पटेल ने कहा, “पिताजी अब बुजुर्ग हैं और 45 साल पुराना मामला अब बहुत छोटी बात है। हमने आपसी सहमति से केस खत्म कर दिया है।”

यह मामला भारतीय न्यायिक प्रणाली की कछुआ चाल और पुलिस की सुस्ती पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या 100 रुपये की चोरी के लिए 45 साल बाद किसी बुजुर्ग को सलाखों के पीछे भेजना न्याय है? या फिर यह सिर्फ रिकॉर्ड सुधारने की एक ‘कागज़ी’ खानापूर्ति थी?

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