तारिक आज़मी की मोरबतियाँ: ‘अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती’, कफ सिरप सिंडिकेट के पावर सेंटर अमित यादव की गिरफ्तारी; कलम को जेल भेजने वालों का अपना अंत शुरू…!
वाराणसी: कफ सिरप सिंडिकेट का 'पावर सेंटर' अमित यादव गिरफ्तार। 2022 से 2025 तक सिंडिकेट के खिलाफ कलम की जंग और झूठे मुकदमे की साजिश का अंत। जानिए कैसे अल्लाह की लाठी ने किया हिसाब और ढह गया शुभम जायसवाल का साम्राज्य।

तारिक आज़मी
वाराणसी: राजनीति में कहा जाता है कि न कोई स्थाई दोस्त होता है और न दुश्मन, लेकिन वाराणसी के कफ सिरप सिंडिकेट में अमित यादव इस जुमले की जीती-जागती नजीर रहे हैं। सपा के जितने करीब, सत्ता के गलियारों में उतनी ही पैठ— लेकिन आज कानून के लंबे हाथों ने इस ‘पावर सेंटर’ को भी सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। लखनऊ एसटीएफ (STF) द्वारा अमित यादव की गिरफ्तारी के साथ ही उस सिंडिकेट का ताबूत आखिरी कील ठुकती नजर आ रही है, जिसने पूर्वांचल से लेकर मध्य प्रदेश तक नशे का जाल फैला रखा था।
झूठे मुक़दमे में मुझे 26/072025 को मध्य प्रदेश पुलिस मेरे आवास से मुझे गिरफ्तार कर ले जाते हुवे का CCTV फुटेज
सिंडिकेट का पतन: एक-एक कर ढहे मोहरे आज की स्थिति यह है कि किंगपिन शुभम जायसवाल भगोड़ा और इनामिया अपराधी घोषित है। अमित जायसवाल पुलिस की गिरफ्त में है, और भोला जायसवाल पहले ही जेल की हवा खा रहा है। कभी वाराणसी की गलियों में अपनी हनक दिखाने वाला यह पूरा सिंडिकेट आज पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुका है।
वो 26 जुलाई 2025: जब कलम को कुचलने की साजिश हुई इस सिंडिकेट के खिलाफ 2022 से लगातार लिखने और उनकी जड़ों पर प्रहार करने की कीमत मुझे (लेखक/संपादक) चुकानी पड़ी। मुझे आज भी वो तारीख याद है— 26 जुलाई 2025। दोपहर के 3 बज रहे थे, मैं बच्चों के साथ घर पर था। अचानक स्थानीय आदमपुर पुलिस दरवाजे पर थी। बेदाग होने के भरोसे के साथ मैं उनके साथ चल पड़ा, लेकिन मेरा ‘सिक्स्थ सेंस’ कह रहा था कि यह कोई साधारण पूछताछ नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश है।

- कुछ दक्षिणपंथी संगठनों के मुखौटे।
- कुछ रसूखदार ‘कद्दावर’ नेता।
- और थाली के चट्टे-बट्टे बने कुछ ‘बहरूपिया पत्रकार’।
शुभम जायसवाल को ‘युवा हिंदू हृदय सम्राट’ बनना था और मुझे रास्ते से हटाना था। कबीर चौरा अस्पताल के सामने मेरी गिरफ्तारी पर मिठाई बांटने वाले आज खुद भागते फिर रहे हैं।
इंसाफ का तराजू: 60 दिन और बेगुनाही का सबूत रीवा सेंट्रल जेल, जिसे देश की सबसे सख्त जेलों में गिना जाता है, वहां मैंने 2 महीने काटे। जहां NDPS एक्ट में जमानत मिलने में साल-डेढ़ साल लग जाते हैं, वहां इस सिंडिकेट के साथ कोई संबंध न होने के कारण अदालत ने मुझे महज़ दो महीने में जमानत दे दी। जेल से बाहर आने पर डर था कि शायद सब खत्म हो गया होगा, लेकिन अल्लाह का करम था कि जिंदगी वहीं खड़ी मिली जहां छोड़ कर गया था, बल्कि उससे दो कदम आगे।
आज का हिसाब: अल्लाह की लाठी आज जब मैं अमित यादव, अमित जायसवाल और शुभम के फरार होने की खबरें लिखता हूं, तो यकीन हो जाता है कि ऊपर वाले के यहां देर है, अंधेर नहीं। जिन्होंने मुझे झूठे केस में फंसाकर जेल की सलाखों के पीछे भेजा था, आज वे खुद उसी दहलीज पर खड़े हैं। सिंडिकेट तबाह हो चुका है और कलम आज भी उतनी ही ताकत के साथ चल रही है।
ये उन सभी के लिए सबक है जो सत्ता और पैसे की हनक में पत्रकारों की आवाज दबाना चाहते हैं। साजिशें अस्थाई होती हैं, लेकिन सच हमेशा स्थाई होता है।











