राजस्थान: पूर्व भाजपा सांसद जौनापुरिया की ‘नफरती सियासत’ पर भारी पड़ी गांव की ‘एकता’; मुस्लिम महिलाओं के अपमान पर पूरे गांव ने लौटाए कंबल, मुस्लिम महिलाओं का किया सम्मान
टोंक: पूर्व भाजपा सांसद सुखबीर जौनापुरिया के 'नफरती' व्यवहार पर ग्रामीणों का करारा जवाब! मुस्लिम महिलाओं से कंबल वापस लेने पर पूरे गांव ने लौटाए कंबल। कांग्रेस नेताओं ने किया महिलाओं का सम्मान।

मो0 सलीम
निवाई/टोंक (PNN24 News): राजस्थान के टोंक-सवाई माधोपुर के पूर्व भाजपा सांसद सुखबीर सिंह जौनापुरिया एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। निवाई क्षेत्र के करेड़ा बुजुर्ग गांव में आयोजित एक कंबल वितरण कार्यक्रम में जो हुआ, उसने न केवल राजनीतिक मर्यादाओं को तार-तार किया, बल्कि सामाजिक सौहार्द पर भी सवाल खड़े कर दिए। हालांकि, ग्रामीणों ने अपने एकजुट विरोध से यह साबित कर दिया कि इंसानियत राजनीति से ऊपर है।

“जो मोदी को गाली देने वाला है, उसे ये कंबल लेने का हक ही नहीं है। यह सरकारी कार्यक्रम नहीं, मेरा व्यक्तिगत आयोजन है। चाहे किसी को बुरा लगे या भला, मैं इन्हें कंबल नहीं दूंगा।”
पूरे गांव ने किया बहिष्कार, लौटाए कंबल पूर्व सांसद के इस व्यवहार से ग्रामीण आक्रोशित हो गए। जब स्थानीय लोगों ने आपत्ति जताई, तो जौनापुरिया बिना जवाब दिए वहां से चले गए। इसके विरोध में गांव के सभी जरूरतमंदों ने आत्मसम्मान चुनते हुए अपने-अपने कंबल आयोजकों को वापस लौटा दिए। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश था— “अगर हमारे पड़ोसियों का अपमान होगा, तो हमें आपकी इमदाद नहीं चाहिए।”
रात में दिखा ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ का असली चेहरा जहां दोपहर में नफरत का बीज बोने की कोशिश हुई, वहीं रात 8:30 बजे गांव ने ‘इंसानियत’ की मिसाल पेश की। पूर्व सरपंच और कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीण एकजुट हुए।
- महिलाओं का सम्मान: ग्रामीणों ने अपमानित महसूस कर रही तीनों महिलाओं— सकुरान, रजिया और जुबैदा को बुलाकर उनका सार्वजनिक सम्मान किया।
- विक्रम चौधरी का प्रहार: कांग्रेस नेता विक्रम चौधरी ने कहा, “किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव करना राजस्थान की संस्कृति नहीं है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।”
वायरल वीडियो से मचा सियासी हड़कंप इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कांग्रेस इसे भाजपा की ‘विभाजनकारी राजनीति’ का सबूत बता रही है, जबकि जौनापुरिया इसे अपना निजी फैसला बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं। लेकिन करेड़ा बुजुर्ग गांव के इस ‘कंबल वापसी’ आंदोलन ने सत्ता और रसूख के अहंकार को आईना दिखा दिया है।











