बंगाल में ‘वोटर लिस्ट’ पर सुप्रीम कोर्ट का सुरक्षा चक्र: निष्पक्षता, जवाबदेही और लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल

तारिक आज़मी

डेस्क: पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जारी गतिरोध पर सुप्रीम कोर्ट का सोमवार का दिशा-निर्देश केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की निष्पक्षता को बनाए रखने का एक गंभीर प्रयास है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस तरह से राज्य सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के बीच के ‘अविश्वास’ को पाटने की कोशिश की है, वह प्रशंसनीय भी है और मौजूदा राजनीतिक माहौल के लिए एक कड़ा संदेश भी।

अधिकारियों की भूमिका और ‘माइक्रो-ऑब्जर्वर’ का विवाद पिछले कुछ हफ्तों से बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच ‘माइक्रो-ऑब्जर्वर’ की नियुक्ति को लेकर रस्साकशी चल रही थी। ममता बनर्जी सरकार का तर्क था कि बाहरी राज्यों और पीएसयू से आए ये ऑब्जर्वर ‘अतिरिक्त-कानूनी’ भूमिका निभा रहे हैं। वहीं, आयोग का कहना था कि राज्य के असहयोग के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालते हुए राज्य को 8550 ‘ग्रुप-B‘ अधिकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि ‘अंतिम फैसला’ केवल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ही लेंगे, जबकि माइक्रो-ऑब्जर्वर केवल उनकी सहायता करेंगे। यह व्यवस्था न केवल प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत करती है, बल्कि उन आशंकाओं को भी दूर करती है कि चुनाव आयोग स्थानीय अधिकारियों की शक्तियों को दरकिनार कर रहा है।

हिंसा और पुलिस महानिदेशक (DGP) की जवाबदेही संपादकीय का सबसे चिंताजनक पहलू चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए सुरक्षा संबंधी मुद्दे हैं। आयोग ने आरोप लगाया कि उसके अधिकारियों को धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, यहाँ तक कि फॉर्म-7 (आपत्तियों वाले दस्तावेज) को जलाया गया और कोई FIR तक दर्ज नहीं हुई।

कोर्ट द्वारा राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर स्थिति सामान्य नहीं है। जब चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय को अपने काम के लिए “शत्रुतापूर्ण” माहौल का सामना करना पड़े, तो यह पूरे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। डीजीपी का व्यक्तिगत हलफनामा अब यह तय करेगा कि क्या बंगाल प्रशासन संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है?

वक्त की दरकार: निष्पक्षता बनाम हठधर्मिता कोर्ट ने 14 फरवरी की समय सीमा को एक हफ्ते के लिए बढ़ाकर यह सुनिश्चित किया है कि दस्तावेजों की जांच में कोई जल्दबाजी न हो। विशेष रूप से यह टिप्पणी कि “ERO आपत्तियों पर विचार करने के लिए बाध्य है, चाहे शिकायतकर्ता व्यक्तिगत रूप से पेश हो या नहीं”, उन दावों पर अंकुश लगाएगी जो केवल तकनीकी आधार पर आपत्तियों को खारिज करना चाहते थे।

लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता ‘पवित्र’ होती है। यदि इसमें किसी एक पक्ष का भी दखल संदिग्ध लगे, तो जनादेश की वैधता समाप्त हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने यह सुनिश्चित किया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव सुधार की प्रक्रिया न तो ‘अराजकता’ की भेंट चढ़े और न ही ‘प्रशासनिक तानाशाही’ की। अब जिम्मेदारी राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की है कि वे आयोग को वह सहयोग प्रदान करें, जिसकी अपेक्षा एक स्वस्थ लोकतंत्र में की जाती है। “गांधी बाबा” की इस भूमि पर चुनावी शुचिता का बना रहना अनिवार्य है।

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