‘वाराणसी में मीडिया की “महाजंग”: क्या डिजिटल पत्रकारिता (यूट्यूबर्स) “फर्जी” है या विज्ञापनदाताओं के हितों पर चोट से तिलमिलाए हैं बड़े अखबार? “काशी पत्रकार संघ” क्या पत्रकारों का ‘भगवान’ है जो “प्रमाणपत्र” देगा? जाने न्यू मीडिया की हकीकत..!’
जब सच दिखाने से अखबारों के पेट में दर्द होने लगे! वाराणसी के 'संध्याकालीन' अखबार और 'काशी पत्रकार संघ' की डिजिटल मीडिया के खिलाफ मुहिम की असलियत। क्या यूट्यूबर्स और पोर्टल वाले 'फर्जी' हैं या विज्ञापनदाताओं की काली करतूतें उजागर करना गुनाह है? PNN24 की विशेष बेबाक रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): आज पत्रकारिता उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ ‘खबरों के अंदर की खबर’ अखबारों से गायब हो चुकी है। सत्ता और धनपतियों की चापलूसी जब शिखर पर हो, तब डिजिटल मीडिया और यूट्यूबर्स ही वह रास्ता हैं जो इन बड़े अखबारों के विज्ञापनदाताओं की काली करतूतों को समाज के सामने लाने का साहस जुटा रहे हैं। शायद यही ‘साहस’ वाराणसी के कुछ पारंपरिक अखबारों और संगठनों की आँखों की किरकिरी बन गया है।
1. संध्याकालीन अखबार और ‘वसूली’ का नैरेटिव
वाराणसी से प्रकाशित होने वाले एक मात्र जीवित ‘संध्याकालीन’ अखबार ने इन दिनों डिजिटल मीडिया कर्मियों को ‘फर्जी’ और ‘वसूलीबाज’ बताने की मुहिम छेड़ रखी है। मजे की बात यह है कि इस अखबार के एक बड़े विज्ञापनदाता (शिक्षा माफिया) की कलई हमने खुद खोली थी। क्या यह मुहिम उसी ‘सत्य’ का बदला है? अब अख़बार का नाम मैं इसलिए नहीं लिख रहा हु क्योकि उन्होंने भी किसी का नाम नहीं लिखा है मगर सभी डिजिटल मीडिया वालो को एक लाठी से ‘हुर्रे’ कर रहे है, जो अखबार खुद विज्ञापन के लिए ‘कमीशन’ और ‘पीडीएफ ब्रांड’ के सहारे जीवित हैं, वे डिजिटल क्रांति को ‘कलुआ’ कह रहे हैं।
एक सत्यता और बताता चालू कि वैसे कहने को तो कई सांध्य कालीन अखबार बनारस से प्रकाशित होते है, मगर एक कडवी सत्यता है कि सिर्फ यही एक सांध्य कालीन अखबार ‘जीवित अवस्था में है, अन्यथा बाकि सभी पीडीऍफ़ के सहारे ही पुरे सरकारी विज्ञापनों पर कब्ज़े के लिए है। भाई ये बात मैं ख़ासतौर पर इसलिए भी लिख रहा हु, क्योकि ‘सच जिंदा रहे’, अन्यथा लोग तो कमियाँ निकालते ही रहते है।
वैसे खबर की इस सीरिज़ का इसका एक और भी कारण हो सकता है कि इसी अख़बार से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने एक भवन खरीदा था और भवन विवादित था। ये जानकारी हमारे एक बड़े कर्रे वाले सूत्र ने उपलब्ध करवाया है हमको तो आपको बताते चल रहे है। उस विवादित भवन पर जब कब्ज़े के लिए पत्रकार साहब गए तो वहाँ एक डिजिटल मीडिया के पत्रकार जिनको अब अख़बार यूट्यूबर्स कहकर फर्जी पत्रकार घोषित करने पर जुटा हुआ है, मौजूद थे और कब्ज़े के प्रयास को उन्होंने अपने प्रयास से विफल कर दिया था। ये खीझ उस घटना की भी हो सकती है।
2. “काशी पत्रकार संघ”: संगठन या पत्रकारिता के ‘भगवान’?
पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए बना ‘काशी पत्रकार संघ’ और ‘बनारस प्रेस क्लब’ अब पत्रकार होने का ‘प्रमाणपत्र’ बांट रहे हैं। वह भी इसी अख़बार को दिए जा रहे इस संगठन के पदाधिकारियों के द्वारा। जिस संगठन की नींव पंडित कमलापति त्रिपाठी ने पहले अध्यक्ष बनने से शुरू हुई और इसकी सभी बैठके सम्पदकाचार्य बाबू राव विष्णु पराड़कर के आवास पर होती थी, बाद में इस संगठन मिले आवास का नामकरण पराड़कर जी के नाम पर हुआ जिनको उत्तर प्रदेश के हिंदी पत्रकारिता जगत का भीष्म पितामह कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी के आदर्शों पर पड़ी, आज उसके पदाधिकारी डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड को समझने के बजाय उसे ‘स्वघोषित’ करार दे रहे हैं। क्या पत्रकार सिर्फ वही है जिस पर यह संगठन की मुहर होगी? हो सकता है कि ‘काशी पत्रकार संघ खुद को पत्रकारिता का ‘भगवान्’ समझता हो, मगर कम से कम मेरे लिए तो यह एक महज़ पत्रकारों का संगठन है।
3. ₹500 का ‘सम्मान’ बनाम डिजिटल पावर
‘काशी पत्रकार संघ’ की स्थापना पत्रकारों के हितो के रक्षार्थ हुई। इसके पदाधिकारी शपथग्रहण समारोह में गर्व से शपथ लेते है कि ‘हम पत्रकार हितो में सदैव संघर्षशील रहेगे और तन मन धन से पत्रकार हितो की रक्षा करेगे।’ मगर बड़े अखबारों की असलियत यह है कि वे अपने स्ट्रिंगर्स को ₹500 से ₹800 प्रति माह की ‘रेवड़ी’ जैसी तनख्वाह देते हैं। काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरुण मिश्रा जी और महामंत्री सहित अन्य पदाधिकारियों को चाहिए कि वे इन बड़े मीडिया घरानों के बाहर धरना दें ताकि पत्रकारों को सम्मानजनक वेतन मिले। वैसे PNN24 जैसे डिजिटल संस्थान अपने स्ट्रिंगर्स को इन बड़े अखबारों से कहीं बेहतर मानदेय देते हैं। फिर ‘फर्जी’ कौन हुआ?
मगर मुझे नहीं लगता कि काशी पत्रकार संघ इतना बड़ा ‘रिस्क’ लेगा। क्योकि मीडिया संस्थानों में तो अभी होड़ मची है कि काशी पत्रकार संघ में किसकी मोनोपोली हो। ऐसे में अगर काशी पत्रकार संघ उसी मैनेजमेंट के खिलाफ जाकर धरना प्रदर्शन कर बैठा तो सीन बहुत गंभीर हो जायेगा। कम से कम इतना तो करना चाहिए कि इस संगठन के अध्यक्ष और महामंत्री को अपने खुद के संस्थानों में यह संघर्ष करने की आवाज़ उठानी चाहिए। मगर उनके लिए भी थोडा मुश्किल है, क्योकि आवाज़ दबाई नही जाएगी, विरोध की आवाज़ कुचल दिया जायेगा। यह एक कडवी सच्चाई है। तो फिलहाल काशी पत्रकार संघ अब डिजिटल मीडिया (यूट्यूबर्स) को ‘फर्जी’ का प्रमाणपत्र बाट रहे है। कुछ ऐसे भी मेरी जानकारी में पत्रकार है जो है तो बड़े मीडिया संसथान में मगर वेतन के नाम पर शुन्य है। फिर उनके घर का खर्च कैसे चलता होगा इसको समझने के लिए कही से पीएचडी नहीं करना पड़ेगा।
4। ‘कचौड़ी-पकौड़ी’ पत्रकारिता का बहिष्कार
डिजिटल मीडिया और यूट्यूबर्स से हमारी अपील है: सरकारी या राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘एक कचौड़ी और दो पकौड़ी’ के लिए जाना छोड़ दें। जब आप जाना बंद करेंगे, तब इन आयोजकों को समझ आएगा कि आपकी पहुँच और ‘न्यू मीडिया’ की ताकत क्या है। विज्ञापन के दबाव में दबी कलम से बेहतर है स्वतंत्र डिजिटल आवाज़।
📝 अब तो काका भी बोल पड़े
काका बोले: “बबुआ, जो खुद शीशे के घर में रहते हैं, उन्हें दूसरों के ‘डिजिटल’ घरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए!”
आज शाम जब काका ने अखबारों और यूट्यूबर्स के बीच की ‘नूरा-कुश्ती’ के बारे में सुना, तो चश्मा नाक पर टिकाते हुए बोले।
“बबुआ, ई तो वही बात हुई कि हाथी चले बाज़ार और….., आगे तो तुम जानते ही हो। वाराणसी में जो लोग खुद को पत्रकारिता का ‘भगवान’ मानकर बैठे हैं, उन्हें डिजिटल मीडिया की रफ़्तार से डर लग रहा है। क्यों? क्योंकि अब खबर दबाना मुमकिन नहीं रहा। पहले अखबार वाले खबर ‘मैनेज’ कर लेते थे, अब यूट्यूबर उसे ‘वायरल’ कर देता है। यही असली पेट दर्द की दवा है!”
मैंने पूछा— “काका, ये ‘फर्जी’ और ‘वसूली’ वाले आरोपों पर क्या कहेंगे?”
काका का जवाब: “अरे बबुआ, ‘काबुल में गधे भी होते हैं’, वैसे ही कुछ लोग गलत हो सकते हैं। पर क्या बड़े अखबारों में सब दूध के धुले हैं? हमने तो कइयों को दीपावली पर पटाखों के लिए झोला लेकर घूमते देखा है। काशी पत्रकार संघ को चाहिए कि वो पत्रकारों के ‘हक’ की बात करे, न कि ‘पहचान पत्र’ बांटने की दुकान खोले। पराड़कर भवन का सम्मान है, पर संगठन के कुछ लोगों की ‘मोनोपोली’ मानसिकता ने इस पेशे को नुकसान पहुँचाया है। याद रखना बबुआ, कलम की ताकत किसी कार्ड की मोहताज नहीं होती, वो तो ‘नियत’ से चलती है!”
📊 डिजिटल बनाम पारंपरिक: एक कड़वा सच (The Reality Check)
| मानक | पारंपरिक अखबार (बड़े घराने) | डिजिटल मीडिया / यूट्यूबर्स |
| स्ट्रिंगर वेतन | ₹500 – ₹800 प्रति माह | बेहतर मानदेय और स्वायत्तता |
| खबर की रफ़्तार | अगले दिन सुबह (बासी खबर) | रियल-टाइम (तुरंत अपडेट) |
| दबाव | बड़े विज्ञापनदाता और सत्ता का डर | स्वतंत्र और बेबाक (अक्सर) |
| पहुँच | सीमित (शहर और क्षेत्र तक) | वैश्विक (इंटरनेट के माध्यम से) |
वैसे मुझे उम्मीद है कि कई पत्रकारों के मसीहा खुद को समझने वालो को अपने जवाब मिल गए होंगे। वैसे कीचड उछालना न मेरा काम है और न फितरत, और न ही मेरे कलम में इतनी स्याही फ़ालतू है। मगर पिछले कई दिनों से फेसबूकिया दुनिया में ऐसे पोस्ट देख रहा था। अब जब अखबार भी ऐसे पोस्ट को अपने यहाँ बड़े बड़े अक्षरों में जगह देने लगे है तो शायद जवाब एक बार तो बनता है। इसीलिए भाई अपने हिस्से का काम करे सब। हकीकत ये है कि डिजिटल मीडिया पेट में दर्द दे बैठा है क्योकि इनकी ताय्दात इतनी ज्यादा है कि जल्दी मैनेज नहीं होते है। जबकि अभी तक मोनोपोली का खेल चल रहा था।
मोनोपोली देखना है तो काशी पत्रकार संघ और वाराणसी प्रेस क्लब के सदस्यों की लिस्ट उठा कर देख ले। सदस्यता के लिए बड़े बड़े मीडिया संस्थान खुद की मोनोपोली कायम रखने की रेस में लगे हुवे है। बकिया रही पत्रकार हितो के लिए संघर्ष करने की बात तो बयानों में अक्सर हो जाती है। इसी वाराणसी के लंका थाने पर एक खबर को उठाने के कारण हुई किरकिरी से बचने के लिए कई पत्रकारों पर लंका थाने में मुकदमा दर्ज हुआ था। उस मामले में सबसे पहले मैंने वीडियो बनाया था और कृत्य की निंदा किया था। पत्रकारों के संगठन तो कई दिनों बाद बयान जारी कर रहे थे सिर्फ। जबकि होना ये चाहिए था कि संगठन को सबसे पहले संज्ञान लेकर उच्चाधिकारियों से संपर्क कर तब तक उनके दफ्तर में बैठ जाना चाहिए था जब तक इस झूठी ऍफ़आईआर करवाने वाले पर कार्यवाई नहीं होती।












