‘तेल की कीमतें बनेंगी हथियार’: ईरान की रणनीति का खुलासा; खाड़ी देशों के ऊर्जा ठिकानों पर हमला कर अमेरिका को घुटनों पर लाने का प्लान

ईरान की 'ऑयल वॉर' रणनीति! तेहरान यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट हसन अहमदीन का बड़ा खुलासा— "ईरान खाड़ी देशों को नहीं, बल्कि उनके ज़रिए अमेरिका को चोट पहुँचा रहा है।" वैश्विक तेल कीमतों को हथियार बनाकर अमेरिका को झुकाने की तैयारी।

आफताब फारुकी

PNN24 News: मध्य पूर्व में जारी महायुद्ध के बीच ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति को एक नया और खतरनाक मोड़ दे दिया है। तेहरान विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ हसन अहमदीन ने अल जज़ीरा को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया है कि ईरान के हमलों का असली लक्ष्य उसके पड़ोसी खाड़ी देश नहीं, बल्कि वहां मौजूद अमेरिकी हित और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार हैं।

1. पड़ोसी दुश्मन नहीं, बल्कि ‘जरिया’ हैं

जब अहमदीन से पूछा गया कि क्या ईरान का अपने पड़ोसियों (UAE, कतर, सऊदी) को निशाना बनाना सही है, तो उन्होंने इसे ‘तर्कहीन’ बताया। उन्होंने कहा कि ईरान का वास्तविक उद्देश्य “अमेरिकी सेना, अमेरिकी ठिकानों और इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों” को नुकसान पहुँचाना है। चूँकि ये देश अमेरिकी सेना की मेजबानी करते हैं और वैश्विक तेल बाज़ार की रीढ़ हैं, इसलिए वे अनचाहे रूप से इस हमले की जद में आ रहे हैं।

2. ‘एनर्जी ब्लैकआउट’ के ज़रिए अमेरिका पर दबाव

अहमदीन के अनुसार, ईरान जानबूझकर खाड़ी देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे (Energy Infrastructure) को निशाना बना रहा है। इसके पीछे की रणनीति बेहद गहरी है:

  • वैश्विक कीमतों में उछाल: तेल और गैस की कीमतों को वैश्विक स्तर पर इतना बढ़ा देना कि अमेरिका के भीतर आर्थिक अस्थिरता पैदा हो जाए।
  • आक्रामकता पर पुनर्विचार: जब अमेरिकी जनता और वैश्विक बाज़ार में तेल की कमी और महंगाई का दबाव बढ़ेगा, तो ट्रंप प्रशासन को ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

3. “क्षेत्रीय नुकसान की कीमत पर अमेरिकी चोट”

ईरान अब उस नीति पर चल रहा है जहाँ वह अमेरिका को नुकसान पहुँचाने के लिए पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता को दांव पर लगाने के लिए तैयार है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इसे ‘अस्तित्व की लड़ाई’ मान रहा है, जहाँ वह दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि यदि ईरान सुरक्षित नहीं है, तो दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति भी सुरक्षित नहीं रहेगी।

हसन अहमदीन का यह विश्लेषण डरावना है। यह स्पष्ट करता है कि ईरान अब केवल सैन्य ठिकानों पर हमला नहीं कर रहा, बल्कि वह ‘इकोनॉमिक टेररिज्म’ (आर्थिक आतंकवाद) का सहारा लेकर अमेरिका की घरेलू राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को निशाना बना रहा है। अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो कतर की एलएनजी और सऊदी का तेल बाज़ार से गायब हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों की जेब पर पड़ेगा।

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