ट्रंप की ‘डेडलाइन’ अनसुनी: क्यों IRGC ने नहीं डाले हथियार? विचारधारा, रसूख और अरबों का साम्राज्य— जिसने ‘आत्मसमर्पण’ को बनाया असंभव
ट्रंप की 'हथियार डालो या मरो' की धमकी ईरान में बेअसर। आखिर क्यों IRGC ने नहीं किया आत्मसमर्पण? समझिए रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का वह चक्रव्यूह जो विचारधारा, सत्ता और अरबों की अर्थव्यवस्था से बना है।

तारिक आज़मी
PNN24 News: शनिवार को जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ा। उन्होंने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC), पुलिस और सेना को सीधे संबोधित करते हुए कहा, “हथियार डाल दो तो सुरक्षा मिलेगी, वरना निश्चित मृत्यु।” लेकिन परिणाम उम्मीद के उलट रहा। IRGC ने न केवल हथियार डालने से मना किया, बल्कि इज़राइल और खाड़ी देशों पर मिसाइलों की बरसात कर दी। आखिर क्या वजह है कि ट्रंप की यह अपील अनसुनी रह गई?
1. ‘वलायत-ए-फकीह’: सिर्फ सेना नहीं, एक विचारधारा
IRGC कोई सामान्य फौज नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद बनी यह संस्था सीधे ‘सर्वोच्च नेता’ (सुप्रीम लीडर) के प्रति जवाबदेह है। इसका मूल सिद्धांत ‘वलायत-ए-फकीह’ है, जिसका अर्थ है इस्लामी न्यायविद की देखरेख में क्रांति की रक्षा करना। इनके लिए सर्वोच्च नेता केवल एक कमांडर नहीं, बल्कि एक धार्मिक मार्गदर्शक हैं। आयतुल्लाह अली खामनेई की शहादत ने इनके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला को और भड़का दिया है।
2. ‘प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था’ पर नियंत्रण
IRGC केवल मोर्चे पर नहीं लड़ती, वह ईरान की अर्थव्यवस्था की धड़कन है।
- प्रमुख क्षेत्र: तेल, गैस, दूरसंचार, बुनियादी ढांचा और खनन जैसे क्षेत्रों में IRGC से जुड़ी कंपनियों का एकाधिकार है।
- प्रतिबंधों का तोड़: जब दुनिया ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए, तो IRGC ने “प्रतिरोध अर्थव्यवस्था” (Resistance Economy) विकसित की, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने। आत्मसमर्पण का अर्थ उनके लिए केवल हथियार डालना नहीं, बल्कि अपना अरबों का आर्थिक साम्राज्य खोना भी है।
3. बासिज और कुद्स फोर्स: सुरक्षा का दोहरा घेरा
- बासिज (Basij): यह लगभग 4,50,000 सदस्यों वाला एक स्वयंसेवी अर्धसैनिक बल है। ये आम नागरिक हैं जो विचारधारा से ओत-प्रोत हैं। इन्हें ‘मानव लहरों’ (Human Waves) के रूप में आत्मघाती मिशनों के लिए भी जाना जाता है।
- कुद्स फोर्स: यह ईरान की सीमाओं के बाहर ‘प्रतिरोध की धुरी’ (Axis of Resistance) का नेतृत्व करती है, जिससे ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव बना रहता है।
4. क्या सैन्य शासन की ओर बढ़ रहा है ईरान?
विशेषज्ञों का मानना है कि खामनेई की मृत्यु के बाद ईरान में लोकतंत्र आने के बजाय IRGC की पकड़ और मजबूत होगी। अटलांटिक काउंसिल के जोनाथन पैनिकॉफ के अनुसार, ईरान अब एक “सैन्य-नियंत्रित राज्य” बन सकता है, जहाँ सत्ता के सूत्र पूरी तरह IRGC के हाथों में होंगे, भले ही प्रतीकात्मक रूप से कोई नया सर्वोच्च नेता सामने रखा जाए।
5. कूटनीति पर अविश्वास
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अनुसार, अमेरिका ने ‘परमाणु वार्ता’ के बीच हमला करके अविश्वास की खाई को इतना गहरा कर दिया है कि अब बातचीत की गुंजाइश खत्म हो गई है। पूर्व रक्षा अधिकारी माइकल मुलरॉय के अनुसार, ईरान के विभिन्न शक्ति केंद्र (मौलवी, सेना, खुफिया सेवा) कभी भी ट्रंप के निर्देशों का पालन नहीं करेंगे।
ट्रंप की अपील इसलिए विफल रही क्योंकि उन्होंने IRGC को केवल एक सैनिक बल समझा, जबकि वह ईरान की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचना की नींव है। खामनेई ने अपने उत्तराधिकारियों और कमान श्रृंखला को पहले ही नियुक्त कर दिया था, जिससे नेतृत्व का शून्य पैदा नहीं हुआ। अब यह संघर्ष ‘सत्ता परिवर्तन’ से कहीं आगे बढ़कर अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।











