‘सुरों की “आशा” का अंत: नहीं रहीं संगीत जगत की सबसे वर्सेटाइल आवाज़ आशा भोसले; लता दीदी के साये से निकलकर खुद बनीं एक “सूरज”; संघर्षों से जीती वो जंग जो हमेशा रहेगी मिसाल!’

संगीत की दुनिया का 'मुकम्मल आसमां' हुईं खामोश। मशहूर गायिका आशा भोसले का रविवार को निधन। लता मंगेशकर के साये से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने वाली 'सुरों की मलिका' का संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक सफर। नया दौर से रंगीला तक, उनकी आवाज़ की शोखियाँ हमेशा रहेंगी जवान। PNN24 की विशेष श्रद्धांजलि रिपोर्ट।

तारिक खान 

PNN24 News: भारतीय संगीत का वो सुर आज खामोश हो गया जिसने सात दशकों तक पीढ़ियों को गुनगुनाने पर मजबूर किया। आशा भोसले का निधन केवल एक गायिका का जाना नहीं, बल्कि उस ‘ज़िद’ का शांत होना है जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।

1. साये से शिखर तक का सफर

आशा भोसले की सबसे बड़ी चुनौती उनकी अपनी बहन, महान लता मंगेशकर थीं। जहाँ लता ‘नंबर एक’ पर विराजमान थीं, वहीं आशा को वर्षों तक बी-ग्रेड फिल्मों और उन गानों से संतोष करना पड़ा जिन्हें अन्य गायिकाएं ठुकरा देती थीं।

  • शुरुआती संघर्ष: पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद 14 साल की उम्र से ही संघर्ष शुरू हुआ।
  • निजी त्रासदी: 16 साल की उम्र में गणपतराव भोसले से शादी ने परिवार से दूरियां बढ़ाईं और निजी जीवन में गहरे ज़ख्म दिए।

2. आवाज़ का कायाकल्प: ओ.पी. नैयर और एस.डी. बर्मन

आशा के करियर में मोड़ तब आया जब ओ.पी. नैयर ने उनकी आवाज़ की गहराई को पहचाना। ‘नया दौर’ की सफलता ने उन्हें मुख्यधारा की नायिकाओं की आवाज़ बना दिया। वहीं, जब लता और एस.डी. बर्मन के बीच मनमुटाव हुआ, तो आशा ने अपनी प्रतिभा से यह साबित कर दिया कि वे किसी की ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘अद्वितीय’ हैं।

3. पंचम और आशा: एक क्रांतिकारी जोड़ी

आर.डी. बर्मन (पंचम) और आशा भोसले की जोड़ी ने संगीत की परिभाषा बदल दी।

  • बोल्ड और आधुनिक: ‘दम मारो दम’ और ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे गानों ने उन्हें ‘कैबरे क्वीन’ बनाया।
  • संजीदगी: वहीं ‘इजाज़त’ फिल्म के ‘मेरा कुछ सामान’ ने दिखाया कि वे कविता के दर्द को कितनी रूहानियत से गा सकती हैं।

4. ‘उमराव जान’ और शास्त्रीय ठहराव

आशा भोसले की कलात्मकता का चरम तब दिखा जब संगीतकार खय्याम ने उनसे ‘उमराव जान’ की गज़लें गवाईं। अपनी आवाज़ को डेढ़ सुर नीचे ले जाकर उन्होंने जो मखमली जादू बिखेरा, उसने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया और दुनिया को उनकी आवाज़ का एक नया पहलू दिखाया।

“उनकी आवाज़ ‘जवान’ थी। चाहे वो ‘नया दौर’ का दौर हो या ‘रंगीला’ का ज़माना, उनकी आवाज़ कभी बूढ़ी नहीं हुई। उन्होंने हर दौर के नए संगीत को गले लगाया। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, सुर तो बहुत हैं, पर जो सुर ज़िन्दगी की हर ठोकर को एक नगमे में बदल दे, वही असली कलाकार है’। आज संगीत का एक कोना सूना हो गया है।”

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