वर्दी का रसूख और कानून का राज: मेरठ की ‘मर्दानी’ डीएसपी सुचित सिंह, गोदी मीडिया जिसको धमकी कह रही वह “लेडी सिंघम” की कर्तव्य निष्ठा है
मेरठ की डीएसपी सुचित सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां गोदी मीडिया इसे 'धमकी' का रंग दे रहा है, वहीं हकीकत में यह एक निडर अधिकारी द्वारा दंगा रोकने और कानून व्यवस्था बनाए रखने की साहसिक कोशिश है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

शफी उस्मानी
मेरठ: आज के दौर में जब ‘भीड़तंत्र’ कानून को अपने हाथ में लेना अपनी शान समझने लगा है, तब मेरठ की डीएसपी सुचित सिंह जैसी महिला अधिकारी उम्मीद की किरण बनकर सामने आई हैं। सोशल मीडिया पर सुचित सिंह का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे लेकर मुख्यधारा के मीडिया का एक वर्ग (गोदी मीडिया) उन्हें निशाना बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अगर चश्मा उतारकर ईमानदारी से देखा जाए, तो यह वीडियो एक महिला अधिकारी की ‘मदानगी’ और अपने कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण है
क्या है पूरा मामला?
वाकया पिछले दिनों मेरठ में निकली परशुराम शोभा यात्रा का है। अक्सर देखा जाता है कि भीड़ में शामिल कुछ अराजक तत्व आस्था की आड़ में शक्ति प्रदर्शन की मर्यादा लांघ जाते हैं। इस यात्रा में भी कई युवक हाथों में फरसे, लाठी-डंडे और धारदार हथियार लहरा रहे थे। सड़क पर हथियारों का यह प्रदर्शन न केवल डराने वाला था, बल्कि किसी भी वक्त सांप्रदायिक तनाव या दंगे की शक्ल ले सकता था।
जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी, तो डीएसपी सुचित सिंह ने मोर्चा संभाला। उन्होंने माइक हाथ में लिया और सीधे उन युवकों को ललकारा जो कानून की धज्जियां उड़ा रहे थे। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी:
”सारी वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है, किसी एक को भी बख्शा नहीं जाएगा। जो भी हथियार लहरा रहे हैं, उन सभी पर FIR दर्ज की जाएगी।”
बहादुरी या धमकी? नजरिये का फर्क
जैसे ही यह वीडियो सामने आया, गोदी मीडिया के न्यूज़ रूम्स में बैठे ‘विष पुरुषों’ और ‘विषकन्याओं’ ने इसे सुचित सिंह की ‘धमकी’ के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया। विडंबना देखिए, जो मीडिया नफरत फैलाने के मौके ढूंढता रहता है, उसे कानून का पालन करवाना ‘धमकी’ नजर आने लगा।
हकीकत यह है कि सुचित सिंह ने किसी धर्म या समाज के खिलाफ नहीं, बल्कि अराजकता के खिलाफ आवाज उठाई। जो लोग अपने घरों में मर्यादा में रहते हैं, वे सड़क पर निकलते ही हथियारों के जोर पर अपनी बहादुरी दिखाने लगते हैं। सुचित सिंह की एक डांट ने उन ‘बहादुरों’ के फरसे और लाठियां तुरंत किनारे लगवा दिए। यह एक अधिकारी का खौफ नहीं, बल्कि संविधान का रसूख था।
निष्पक्षता की कीमत
आज के माहौल में एक अधिकारी के लिए बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के निष्पक्ष काम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। सुचित सिंह जानती होंगी कि इस निष्पक्षता का इनाम उन्हें शायद ट्रांसफर या किसी कट्टरपंथी संगठन के विरोध के रूप में मिल सकता है। लेकिन उन्होंने इसकी परवाह किए बिना अपने कर्तव्यों को ऊपर रखा।
मेरठ की इस ‘मर्दानी’ अधिकारी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। उन्होंने साबित कर दिया कि वर्दी न तो किसी विचारधारा की गुलाम होती है और न ही किसी दबाव की। सुचित सिंह जैसे अधिकारी ही समाज में उस भरोसे को जिंदा रखे हुए हैं कि कानून की नजर में हर अपराधी बराबर है, चाहे वह हाथ में फरसा लिए हो या लाठी।
हमें गोदी मीडिया की कठपुतली बनने के बजाय, ऐसी जांबाज अधिकारियों का समर्थन करना चाहिए जो समाज में जहर घोलने वालों के सामने दीवार बनकर खड़ी हैं।












