‘पुण्यतिथि विशेष: कैलाश वाजपेयी— जिन्होंने “अकविता” से हिंदी साहित्य को नई दिशा दी; संसद में गूंजी थी जिनकी “राजधानी” और “हवा में हुए थे जिनके हस्ताक्षर”!’
पुण्यतिथि विशेष: 'हवा में हस्ताक्षर' करने वाले आधुनिक हिंदी कविता के दिग्गज कैलाश वाजपेयी को नमन। अकविता आंदोलन के जनक और कबीर-बुद्ध के दर्शन को पर्दे पर उतारने वाले रचनाकार की याद। 'राजधानी' कविता का वो विवाद जिसने संसद हिला दी थी। PNN24 की विशेष साहित्यिक प्रस्तुति।

तारिक आज़मी
PNN24 News: आज 1 अप्रैल है। ठीक 11 साल पहले, यानी 1 अप्रैल 2015 को आधुनिक हिंदी कविता के एक युग का अंत हुआ था, जब मशहूर कवि कैलाश वाजपेयी इस दुनिया से रुखसत हुए। ‘सन साठ के बाद की कविता’ धारा के प्रमुख स्तंभ और ‘अकविता’ आंदोलन के जनक वाजपेयी ने न केवल शब्दों को धार दी, बल्कि समाज के मोहभंग और असंतोष को एक नई आवाज़ प्रदान की।
1. हमीरपुर से दिल्ली तक का सफ़र
11 नवंबर 1936 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में जन्मे कैलाश वाजपेयी की शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ उन्होंने वाचस्पति की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने पत्रकारिता से लेकर प्राध्यापन तक का सफर तय किया। उन्होंने दूरदर्शन के लिए कबीर, बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस और जे. कृष्णमूर्ति जैसे महापुरुषों के जीवन-दर्शन पर फिल्में बनाकर भारतीय प्रज्ञा को जन-जन तक पहुँचाया।
2. ‘राजधानी’ और वो ऐतिहासिक विवाद
कैलाश वाजपेयी की कविता यात्रा एक मधुर गीतकार के रूप में शुरू हुई थी, लेकिन जल्द ही उनके स्वर तीखे और विद्रोही हो गए। उनकी कविता ‘राजधानी’ इतनी मारक थी कि उस दौर में संसद में इस पर भारी हंगामा हुआ और इस पर प्रतिबंध की माँग तक की गई। यह कविता व्यवस्था के खोखलेपन पर करारी चोट थी।
3. हवा में हस्ताक्षर: साहित्य अकादमी सम्मान
साहित्य के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण उनकी कालजयी कृति ‘हवा में हस्ताक्षर’ है, जिसके लिए उन्हें 2009 में प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके काव्य संग्रह ‘तीसरा अँधेरा’, ‘देहांतर’ और ‘पृथ्वी का कृष्णपक्ष’ आज भी पाठकों को जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों से रूबरू कराते हैं।
उनके शब्दों में कबीर जैसी फकीरी और बुद्ध जैसी शांति, दोनों थी। उन्होंने दूरदर्शन पर बुद्ध और कबीर को सिर्फ दिखाया नहीं, बल्कि जिया था। आज 1 अप्रैल है, दुनिया भले ही इसे ‘मूर्ख दिवस’ कहे, पर साहित्य के लिए आज का दिन ‘मौन’ रहने का है। वाजपेयी जी चले गए, पर उनके ‘हवा में किए गए हस्ताक्षर’ आज भी हमारे आसमान पर चमक रहे हैं। काशी की गलियों से उस महान कलमकार को हमारा सलाम!”











