‘मोहम्मदाबाद में “इलाज” कम, “जांच का जाल” ज़्यादा: डॉक्टरों की एक “कलम” खाली कर रही मरीजों की जेब; जन औषधि केंद्रों में अलमारी की शोभा बढ़ा रही सस्ती दवाएं, कमीशन के खेल में पिस रही जनता!’
गाजीपुर विशेष: मोहम्मदाबाद में स्वास्थ्य सेवा या 'कमाई का अड्डा'? मामूली बीमारी पर भी महंगी जांचों का जाल, निजी सेंटरों से डॉक्टरों का मोटा कमीशन। जन औषधि केंद्रों में 'शोपीस' बनी सस्ती दवाएं, मरीजों को थमाई जा रही हैं महंगी बाहरी दवाइयां। क्या प्रशासन तोड़ेगा डॉक्टर और दवा माफिया का यह घातक गठबंधन? PNN24 की विशेष पड़ताल।

रेयाज़ अहमद
मोहम्मदाबाद, गाजीपुर (PNN24 News): गाजीपुर जनपद के मोहम्मदाबाद में स्वास्थ्य सेवाओं की सूरत अब ‘सेवा’ से बदलकर ‘शुद्ध व्यापार’ में तब्दील हो गई है। यहाँ अस्पतालों और क्लीनिकों में पहुँचने वाले मरीजों का इलाज उनके लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी ‘आर्थिक क्षमता’ के आधार पर शुरू होता है। मामूली सिर दर्द या पेट दर्द लेकर आने वाले सामान्य मरीजों को भी सीधे अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और खून की महंगी जांचों के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाता है।
1. ‘अनुभव’ पर भारी ‘कमीशन’ का खेल
स्थानीय मरीजों का आरोप है कि डॉक्टर अब अपने चिकित्सकीय अनुभव का उपयोग प्राथमिक उपचार में कम और ‘जांच लिखने’ में ज़्यादा कर रहे हैं।
- नेक्सस: चर्चा है कि निजी जांच केंद्रों और डॉक्टरों के बीच ‘फिक्स्ड कमीशन’ का एक गुप्त समझौता काम कर रहा है। जितनी महंगी जांच, उतना मोटा हिस्सा।
- दोहरी मार: मरीज न केवल बीमारी से टूटता है, बल्कि जांच केंद्रों के चक्कर काटते-काटते उसकी जेब भी पूरी तरह ढीली हो जाती है।
2. जन औषधि केंद्र: नाम ‘सस्ती दवा’, काम ‘महंगा मुनाफा’
सरकारी दावों के विपरीत, मोहम्मदाबाद के कई जन औषधि केंद्रों की स्थिति सवालों के घेरे में है।
- शोपीस: यहाँ गरीबों के लिए भेजी गई सस्ती जेनेरिक दवाएं काउंटर के पीछे अलमारियों में बंद रहती हैं।
- महंगा भंडार: इसके उलट, काउंटर के अंदर और बाहर महंगी ब्रांडेड दवाओं का भंडार सजा रहता है। जब कोई मरीज सस्ती दवा मांगता है, तो ‘स्टॉक नहीं है’ का रटा-रटाया जवाब देकर उसे महंगी दवा लेने पर मजबूर किया जाता है।
3. सरकारी और निजी: सब एक ही सिक्के के दो पहलू
चाहे वो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) हो, ट्रामा सेंटर हो या नामी निजी अस्पताल— हर जगह मरीज खुद को एक ऐसे सिस्टम में फँसा हुआ महसूस कर रहा है जहाँ उसकी बीमारी महज एक ‘मार्केटिंग टूल’ है। डॉक्टरों और दवा केंद्रों की यह ‘जुगलबंदी’ अब आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुकी है।
“डॉक्टर को भगवान का रूप कहा जाता था, पर मोहम्मदाबाद में तो कुछ लोग ‘यमराज के मुनीम’ जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मामूली पेट दर्द में ₹5000 की जांच लिख देना कौन सी डॉक्टरी है? और ई जन औषधि केंद्र… गरीबों को सस्ती दवा देने के लिए खुले थे, पर वहां भी ‘कमीशन’ का ऐसा सुलेसन लगा है कि सस्ती दवा बाहर ही नहीं निकलती। सरकारी खजाने से तनख्वाह और मरीजों से कमीशन— ई तो ‘दोहरा लाभ’ वाला व्यापार चल रहा है।”
अब रही लगाम लगने की बात तो “लगाम तो तब लगेगी बाबु जी , जब ऊपर बैठे साहब लोग भी इस ‘सिस्टम’ का हिस्सा न हों। जब डॉक्टर को पता है कि उसे पूछने वाला कोई नहीं है, तो वो तो अपनी कलम चलाएगा ही। मोहम्मदाबाद के लोग कह रहे हैं कि अब अस्पताल जाना ‘बीमारी का इलाज’ नहीं, बल्कि ‘जेब का ऑपरेशन’ करवाना है। काशी के विश्वनाथ बाबा से यही दुआ है कि कम से कम इन सफेद कोट वालों को थोड़ी सद्बुद्धि मिले, वरना जनता जब ‘क्रांतिकारी’ बनती है, तो बड़े-बड़े चश्मे उतर जाते हैं!”












