‘दालमंडी: विकास की “बलि” चढ़ा मानवीय जीवन? वसीम कटरे में लापरवाही से तोड़फोड़ ने बुज़ुर्ग को किया लहूलुहान; बिल्डर के रसूख के आगे क्या नतमस्तक है पुलिस?’
वाराणसी: 'विकास' की रफ़्तार में फिर बहा बेगुनाह का खून! दालमंडी के वसीम कटरे में लापरवाही से हो रही तोड़फोड़ ने ली बुजुर्ग की सुध-बुध। सिर पर ईंट गिरने से 65 वर्षीय मोईनुद्दीन गंभीर रूप से घायल। पीड़ित परिवार का आरोप— "पुलिस नहीं लिख रही FIR, समझौते का बना रही दबाव।" PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

ईदुल अमीन
वाराणसी (PNN24 News): काशी के दालमंडी इलाके में चल रहे चौड़ीकरण अभियान ने एक बार फिर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ा दी हैं। वसीम कटरे (भवन संख्या CK 43/170) में कार्यदाई संस्था और ठेकेदार की घोर लापरवाही के कारण एक 65 वर्षीय बुजुर्ग दुकानदार गंभीर रूप से घायल हो गए। इस घटना ने जहाँ एक ओर विकास के नाम पर हो रही अराजकता को उजागर किया है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की ‘सुस्त’ कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।
1. रोज़ी-रोटी की राह में मिली “मौत जैसी चोट”
जानकारी के अनुसार, मो. मोईनुद्दीन (65 वर्ष) रोज़ की तरह सुबह अपनी दुकान खोलने जा रहे थे। जैसे ही वह वसीम कटरे के पास पहुँचे, ऊपर चल रही तोड़फोड़ के दौरान एक ईंट सीधे उनके सिर पर आ गिरी। ईंट लगते ही बुजुर्ग मोईनुद्दीन लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़े। स्थानीय दुकानदारों ने आनन-फानन में उन्हें उठाया और प्राथमिक उपचार कराया। चिकित्सकों ने चोट की गंभीरता को देखते हुए सीटी स्कैन और एमआरआई की सलाह दी है।
2. पुलिस पर “मैनेज” करने का आरोप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि घटना के बाद उन्होंने 112 नंबर पर सूचना दी। पुलिस मौके पर आई और थाने जाकर शिकायत देने को कहा। लेकिन, जब परिजन लिखित शिकायत लेकर थाने पहुँचे, तो पुलिस न्याय दिलाने के बजाय ‘मुआवजा’ लेकर मामला रफा-दफा करने की सलाह देने लगी।
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इलाकाई चर्चा: क्षेत्र में चर्चा है कि तोड़फोड़ कराने वाला व्यक्ति दालमंडी का ही एक प्रभावी बिल्डर है, जिसके रसूख के कारण पुलिस कार्यदाई संस्था के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने से कतरा रही है।
3. सुरक्षा मानकों की अनदेखी
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दालमंडी जैसी घनी आबादी वाले क्षेत्र में बिना किसी जाली, घेराबंदी या सुरक्षा उपायों के तोड़फोड़ का काम जारी है। वसीम कटरे में हो रही यह तोड़फोड़ पहले भी चर्चा में थी, लेकिन प्रशासनिक अनदेखी ने आज एक बुजुर्ग की जान जोखिम में डाल दी।
अब बात ये है कि “यही तो असली खेल है बाबू जी! पुलिस का काम इंसाफ दिलाना है या ‘पंचायत’ करना? जब कानून की लाठी किसी बिल्डर की तिजोरी से दब जाती है, तो वो ‘समझौते’ की बात करने लगती है। अगर आज मोईनुद्दीन साहब को न्याय नहीं मिला, तो कल किसी और का सर फूटेगा। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, कंक्रीट के शहर बनाने से पहले इंसानी खून की कीमत समझना सीख लीजिए’।”












