‘APCR की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: कडप्पा हिंसा में पुलिस पर “एकतरफा कार्रवाई” और नाबालिगों को प्रताड़ित करने का आरोप; FIR 59/2026 पर उठे गंभीर सवाल!’

कडप्पा (आंध्र प्रदेश): अल्मासपेट सर्किल विवाद पर APCR की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे। रिपोर्ट का शीर्षक 'Selective Justice: Detention, Torture & Religious Targeting'। 25 मुस्लिम नाबालिगों को हिरासत में प्रताड़ित करने और एकतरफा पुलिसिया कार्रवाई का आरोप। PNN24 की विशेष खोजी रिपोर्ट।

तारिक आज़मी

कडप्पा/अमरावती (PNN24 News): आंध्र प्रदेश के कडप्पा शहर के अल्मासपेट सर्किल में बीते 9 मई 2026 को हुई सांप्रदायिक हिंसा को लेकर मानवाधिकार संगठन ‘एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ (APCR) ने अपनी तथ्य-जांच (Fact Finding) रिपोर्ट जारी कर दी है। “Selective Justice: Detention, Torture & Religious Targeting” (चयनात्मक न्याय: हिरासत, उत्पीड़न और धार्मिक लक्षीकरण) शीर्षक वाली इस रिपोर्ट ने स्थानीय पुलिस और राज्य तंत्र की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1. विवाद की जड़: क्या है अल्मासपेट सर्किल का मामला?

APCR की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे विवाद की नींव फरवरी 2026 में पड़ी थी। तब स्थानीय नगर निगम ने अल्मासपेट सर्किल का नाम बदलकर “टीपू सुल्तान सर्किल” रखने का एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया था। हालांकि, इस फैसले के विरोध में कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने वहाँ अचानक “हनुमान सर्किल” का बैनर लगा दिया, जिसके बाद से ही दोनों समुदायों के बीच धीरे-धीरे तनाव गहराने लगा था।

2. 9 मई की हिंसा: पुलिसिया दावों के उलट गवाहों के बयान

9 मई को दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ गए, जिसके बाद बहसबाज़ी देखते ही देखते पत्थरबाज़ी, लाठीचार्ज और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों में बदल गई।

  • पुलिस का दावा: स्थानीय पुलिस का कहना है कि हिंसा की शुरुआत और हमला मुस्लिम पक्ष की ओर से किया गया।
  • APCR की रिपोर्ट का दावा: रिपोर्ट में स्थानीय गवाहों और पीड़ितों के बयानों के आधार पर कहा गया है कि पत्थरबाज़ी की शुरुआत पहले गैर-मुस्लिम पक्ष की ओर से हुई थी। इसके बाद पुलिस ने कथित तौर पर मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में घुसकर एकतरफा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की।

3. नाबालिगों के साथ बर्बरता और कस्टोडियल टॉर्चर का आरोप

APCR की रिपोर्ट में पुलिस हिरासत के दौरान मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के कई चौंकाने वाले आरोप लगाए गए हैं:

  • नाबालिगों को यातना: रिपोर्ट के मुताबिक, 25 से अधिक मुस्लिम नाबालिग बच्चों को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में लिया। उन्हें बर्बरता से पीटा गया, जमीन पर लिटाकर पैरों से दबाया गया, गालियां दी गईं और देर रात 2 बजे तक थाने में बिठाकर रखा गया।
  • हिरासत और घायल: बिना किसी ठोस आधार के 22 मुसलमानों को कई दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया, जहाँ कस्टोडियल टॉर्चर (हिरासत में प्रताड़ना) की शिकायतें सामने आईं। इस पूरी हिंसा और पुलिसिया कार्रवाई में लगभग 100 मुसलमान घायल हुए, 25 की गिरफ्तारी हुई और 3 आरोपी वर्तमान में भी रिमांड पर हैं।

4. धाराओं का खेल: FIR नंबर 59/2026 में भेदभाव का आरोप

रिपोर्ट में कानूनी स्तर पर किए गए भेदभाव को साक्ष्यों के साथ रेखांकित किया गया है। FIR नंबर 59/2026 का हवाला देते हुए बताया गया कि:

  • पुलिस ने 27 मुस्लिम आरोपियों पर ‘हत्या के प्रयास’ (Attempt to Murder) जैसी बेहद गंभीर और गैर-जमानती धाराएं लगाई हैं।
  • इसके विपरीत, दूसरे पक्ष यानी गैर-मुस्लिम आरोपियों पर बेहद हल्की और जमानती धाराएं दर्ज की गईं, जो पुलिसिया तंत्र के दोहरे मापदंड और चयनात्मक न्याय को साफ उजागर करता है।

APCR की प्रमुख मांगें:

मानवाधिकार संगठन ने साफ कहा है कि यह सामान्य गुटों की झड़प नहीं, बल्कि राज्य तंत्र द्वारा एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने का सुनियोजित मामला है। संगठन ने प्रशासन से निम्नलिखित मांगें की हैं:

  1. पूरे मामले की एक स्वतंत्र न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) कराई जाए।
  2. मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों पर तत्काल सख्त कार्रवाई हो।
  3. इलाके की सीसीटीवी (CCTV) रिकॉर्डिंग की निष्पक्ष जांच हो ताकि सच सामने आए।
  4. पीड़ितों और घायलों को उचित मुआवजा दिया जाए तथा सभी बंदियों को तत्काल कानूनी सहायता मुहैया कराई जाए।

📝 विशेष कॉलम: मोरबतियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

Tariq Azmi (तारिक आज़मी)

काका का नज़रिया: “बबुआ, कानून की लाठी जब सिर्फ एक ही तरफ घूमती दिखाई दे, तो समझ लो कि इंसाफ के तराजू का पलड़ा सियासत के बोझ से झुक चुका है; अल्मासपेट की ये रिपोर्ट डराती भी है और सिस्टम को आईना भी दिखाती है!”

आज शाम अस्सी घाट की अड़ी पर कडप्पा की इस फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के पन्नों पर गरमागरम बहस छिड़ी थी। काका ने अपने गमछे को कंधे पर संभालते हुए बेहद तल्ख लहजे में अपनी राय रखी।

काका बोले: “बबुआ, नाम बदलने की ये जो बीमारी देश में चली है, वही आज अल्मासपेट में नफरत का बारूद बन गई। नगर निगम ने टीपू सुल्तान का नाम तय किया, तो दूसरे पक्ष ने हनुमान जी का बैनर टांग दिया। यहाँ तक तो सियासत थी, पर जब पत्थर चले और पुलिस बीच में आई, तो उसे ‘इंसाफ की वर्दी’ पहननी चाहिए थी, न कि किसी खास पक्ष की ‘जैकेट’! APCR की रिपोर्ट कह रही है कि 25 नाबालिग बच्चों को रात के दो बजे तक थाने में कस्टोडियल टॉर्चर दिया गया। बबुआ, बच्चे चाहे इस घर के हों या उस घर के, उनके पैरों को बूटों से कुचलना कानून की रक्षा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जुल्म है।”

मैंने पूछा— “काका, FIR की धाराओं में जो अंतर दिख रहा है, उस पर आपका क्या कहना है?”

काका का जवाब: “वही तो असली खेल है बबुआ! एक ही झगड़े में एक पक्ष पर सीधे ‘हाफ मर्डर’ (हत्या का प्रयास) की धारा और दूसरे पर जमानती कागज़? ई साफ दिखाता है कि नीयत में खोट है। कानून का काम समाज में डर फैलाना नहीं, बल्कि अमन और भरोसा बहाल करना होता है। जब जनता का पुलिस से भरोसा उठ जाएगा, तो समाज बिखर जाएगा। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, सत्ताएँ आती-जाती रहेंगी, लेकिन अगर कानून की रूह को ही चयनात्मक न्याय (Selective Justice) का घुन लग गया, तो लोकतंत्र की इमारत को ढहने से कोई नहीं बचा सकता’।”


📊 कडप्पा हिंसा और APCR रिपोर्ट के मुख्य आंकड़े (Fact Box)

विवरण APCR रिपोर्ट के अनुसार मुख्य तथ्य व आंकड़े
घटना का स्थान व समय अल्मासपेट सर्किल, कडप्पा (आंध्र प्रदेश) — 9 मई 2026
विवाद का मुख्य कारण सर्किल के नामकरण (टीपू सुल्तान बनाम हनुमान सर्किल) को लेकर तनाव
नाबालिगों की स्थिति 25 से अधिक मुस्लिम नाबालिगों को हिरासत में प्रताड़ित करने का आरोप
घायल व गिरफ्तार लगभग 100 मुस्लिम घायल, 25 गिरफ्तार, 3 अभी भी रिमांड पर
कानूनी भेदभाव (FIR 59/2026) मुस्लिम आरोपियों पर ‘हत्या के प्रयास’ की धाराएं, दूसरे पक्ष पर हल्की जमानती धाराएं
संगठन की मुख्य मांग स्वतंत्र न्यायिक जांच, सीसीटीवी फुटेज की जांच और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई

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