तारिक आज़मी की मोरबतियाँ: ‘हीरू ओनेडा वो जापानी सैनिक जो 30 साल तक खयाली जंग लड़ता रहा; क्या आज का सोशल मीडिया भी “ओनेडा” बन चुका है?’
क्या हम भी हीरू ओनेडा की तरह एक खत्म हो चुके युद्ध को लड़ रहे हैं? इतिहास के पन्नों से निकलकर सोशल मीडिया के दौर तक, काल्पनिक नफरतों और अतीत के घावों को कुरेदने वाली जमात पर एक विशेष विश्लेषण। PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
आज के दौर में जब हम इंटरनेट खोलते हैं, तो हमें अक्ल के ऐसे ‘अजीम’ दर्शन होते हैं जिनका पैमाना सिर्फ यह है कि सामने वाला उनके चहेते दल का है या विरोधी का। ये लोग आधुनिक दौर के ‘हीरू ओनेडा’ हैं।
1. कौन था हीरू ओनेडा?
19 मार्च 1922 को जन्मे हीरू ओनेडा जापानी इम्पीरियल आर्मी के सेकंड लेफ्टिनेंट थे। 1944 में उन्हें फिलीपींस के एक द्वीप पर भेजा गया था। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो गया, जापान ने सरेंडर कर दिया, लेकिन ओनेडा ने हार नहीं मानी। उन्हें लगता था कि सरेंडर की खबरें और पर्चे अमेरिकी प्रोपेगेंडा हैं। वे अपने साथियों के साथ 30 साल तक जंगलों में छिपे रहे और निर्दोष किसानों को ‘अमेरिकी जासूस’ समझकर मारते रहे।
2. जब 1974 में खुली आँखें
1974 में जब उनके पुराने कमांडिंग अफसर तानिगुची ने खुद जाकर उन्हें आदेश दिया, तब ओनेडा ने सरेंडर किया। जब वे 1984 में वापस अपने देश लौटे, तो उन्हें अपना ही देश पहचान में नहीं आया। वे 1944 की कल्पना में जमे (freeze) हुए थे, जबकि दुनिया चार दशक आगे निकल चुकी थी।
3. आज के “डिजिटल हीरू ओनेडा”
ओनेडा की मृत्यु को 10 साल हो चुके हैं, लेकिन वे मरे नहीं हैं। वे आज सोशल मीडिया पर जीवित हैं। कोई 80 साल पहले के जिन्ना से लड़ रहा है, कोई 400 साल पुराने औरंगजेब से, तो कोई 1000 साल पुराने गजनवी से खंदक खोदकर मुकाबला कर रहा है।
- खयाली जंग, असली मौतें: ओनेडा की तरह ही आज के युवा भी अतीत के किरदारों से जवाब मांग रहे हैं। युद्ध खयाली है, लेकिन इसमें होने वाली नफरत, जिंदगियों की बर्बादी और देश का नुकसान बिल्कुल असली है।
- पहचान का संकट: हम धर्म, जाति और इतिहास के ऐसे ‘कॉम्प्लेक्स’ का शिकार हो गए हैं कि जब हमारी आँखें खुलेंगी (जैसे ओनेडा की खुली थीं), तो शायद हमें अपना ही देश और समाज पहचान में नहीं आएगा।

प्रधान सम्पादक
PNN24 न्यूज़
काका का नज़रिया:
इस विषय पर चर्चा छिड़ी तो काका ने गंभीर होकर कहा— “बबुआ, इतिहास को ढाल बनाकर वर्तमान पर हमला करना बहादुरी नहीं, दिमागी गुलामी है। ओनेडा तो जंगल में था, उसे खबर नहीं थी; पर यहाँ तो सब जानकर भी अनजान बने हैं। जब तक हम गुज़रे हुए कल की कब्रें खोदते रहेंगे, आने वाले कल की नींव कभी मज़बूत नहीं होगी।”
📊 हीरू ओनेडा का सफरनामा (At a Glance)
| वर्ष | घटना |
| 1942 | जापानी इम्पीरियल आर्मी ज्वाइन की। |
| 1944 | फिलीपींस के लुबांग द्वीप पर पोस्टिंग। |
| 1945 | द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त, पर ओनेडा का ‘स्वयंभू’ युद्ध जारी रहा। |
| 1954/1972 | संघर्ष के दौरान उनके साथी मारे गए, ओनेडा अकेले बचे। |
| 1974 | कमांडिंग अफसर के आदेश पर 30 साल बाद सरेंडर किया। |
| 1984 | जापान वापसी, आधुनिक जीवन से सामंजस्य बिठाने में संघर्ष। |
PNN24 न्यूज़ की विचार डेस्क से यह विशेष लेख। समाज को आईना दिखाने वाली ऐसी ही गंभीर रिपोर्टिंग के लिए जुड़े रहें हमारे साथ।











