मदर्स डे पर तारिक आज़मी की मोरबतियाँ: ‘दिखावे का समंदर और वृद्धाश्रम की तन्हाई: मदर्स डे पर एक “कमनसीब” बेटे का दर्द और कुछ चुभते सवाल!’

मदर्स डे विशेष: सोशल मीडिया के दिखावे और वृद्धाश्रमों की कड़वी हकीकत के बीच एक बेटे का भावनात्मक सफ़र। क्या डिजिटल दुनिया के स्टेटस माँ के असली सम्मान की जगह ले सकते हैं? PNN24 की एक विशेष मर्मस्पर्शी रिपोर्ट।

तारिक आज़मी 

वाराणसी (PNN24 News): आज मदर्स डे है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर माँ के प्रति प्रेम की ऐसी नदी बही है कि हर कोई खुद को दुनिया का सबसे बड़ा ‘खिदमतगुज़ार’ बेटा साबित करने में जुटा है। लेकिन इसी भीड़ के बीच एक सवाल सीने में चुभता है— अगर हर बच्चा अपनी माँ का इतना ही दीवाना है, तो वृद्धाश्रमों में मौजूद वे बुजुर्ग महिलाएं किसकी माँ हैं?

Tariq Azmi (तारिक आज़मी)

1. डिजिटल प्रेम बनाम वृद्धाश्रम की हकीकत

समाज के इस ‘मायावी’ स्वरूप पर विचार करना ज़रूरी है। क्या वृद्धाश्रम की उन माओं के बच्चे भी आज सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े स्टेटस डाल रहे होंगे? मुमकिन है कि जवाब ‘हाँ’ हो, क्योंकि आज की दुनिया में सेवा से ज़्यादा दिखावा और चमक-धमक ज़रूरी हो गई है।

2. “मरहूम वालिदा” की याद और वृद्धाश्रम का मरहम

जब घर में माँ की कमी हो, तो उस दर्द की शिद्दत तब और बढ़ जाती है जब दुनिया मदर्स डे मना रही होती है। एक बेटा जिसकी माँ दो दशक पहले ही उसे छोड़कर चली गई। मैं वही कमनसीब बेटा हु। बुजुर्गो ने कहा है “रोने से मरहूम की रूह को तकलीफ पहुचेगी” तो रो भी नही सकता हु। उनकी तस्वीर भी स्टेटस पर नही लगा सकता हु “ये उनकी अजमत के शान में गुस्ताखी होगी” तो अपनी वालिदा की याद में वृद्धाश्रम जाता हु तो वहां दूसरों की माओं से मिलकर जो सुकून मिलता है, वह शायद किसी स्टेटस में नहीं। वे लोग वाकई बदनसीब हैं जिनकी मौजूदगी में उनकी माँ को वृद्धाश्रम में रहना पड़ता है।

3. एक्सीडेंट का दर्द भी पड़ा कमतर

शारीरिक चोट और एक्सीडेंट का दर्द उस रूहानी दर्द के सामने कुछ भी नहीं, जो माँ की कमी से पैदा होता है। ‘रब ने जन्नत जिसके कदमों के नीचे डाल दी’, उसकी अजमत बयान करने के लिए साल का एक दिन क्या, पूरी उम्र भी कम है।


📝 इस न खत्म होने वाले गम पर काका का मरहम 

आज ‘मदर्स डे’ की इस दिखावटी दुनिया पर काका ने अपना मुझे तसल्ली देते हुए बहुत गहरी बात कही।: “बबुआ, सोशल मीडिया पर माँ की फोटो डालना आसान है, पर उनकी आँखों की नमी और दिल की तड़प समझना मुश्किल; असली जन्नत स्टेटस में नहीं, माँ के कदमों की धूल में है!”

काका बोले: “बबुआ, आज मोबाइल खोलते ही माँ ही माँ दिख रही हैं। पर दिल कांप जाता है ई सोचकर कि जो माएँ वृद्धाश्रम में बैठी दरवाज़ा ताक रही हैं, क्या उनके बेटों का डेटा (इंटरनेट) आज खत्म हो गया है? जो बेटा अपनी माँ के गले लगकर अपना दुख-दर्द नहीं कह सकता, उसकी तड़प वही जान सकता है जिसने माँ को खोया है। काश, दुनिया स्टेटस से ज़्यादा सरोकार पर ध्यान देती।”

मैंने पूछा— “काका, क्या एक दिन का सम्मान काफी है?”

काका का जवाब: “बबुआ, जिस माँ ने हमें नौ महीने कोख में रखा और उम्र भर आँखों में, उसके लिए एक दिन? ई तो खुद के साथ मज़ाक है। जिसकी माँ नहीं है, उससे पूछो कि ‘मम्मी-पापा’ कहने को तरस जाना क्या होता है। तुमका तो खुदही इसका अहसास है, हम यही कहते हैं— ‘साहब, जन्नत की तलाश में भटकने वालों, घर लौटकर माँ -बाप के पैर चूम लो, मंज़िल वहीं मिल जाएगी’।”

मेरा उन सभी माओं को नमन, जो आज भी अपने बच्चों की राह ताक रही हैं। माँ का सम्मान हर पल करें, केवल स्टेटस के लिए नहीं।


💔 दिल की आवाज़: एक ‘कमनसीब’ बेटे की पुकार

“किन लफ्जों में लिखू माँ तेरी कमी को, तेरे बिना तो हर लम्हा अधूरा लगता है…! मैं तो अपने वालिदैन का वह कमनसीब बेटा हूँ जो उनके गले लग कर कह भी नहीं सकता कि मम्मी-पापा मैं तकलीफ में हूँ।”

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