‘पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे पर सवाल पूछने को लेकर छिड़ा विवाद; प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नंबर-1 नॉर्वे और 157वें स्थान पर खड़े भारत की कूटनीतिक नोकझोंक का पूरा सच!’
ओस्लो: पीएम नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे पर महिला पत्रकार हेला लेंग के सवाल का जवाब न मिलने से शुरू हुआ विवाद अब दोनों देशों के बीच प्रेस स्वतंत्रता की रैंकिंग की तुलना तक पहुंच गया है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे नंबर 1 पर क्यों है और भारत 157वें स्थान पर क्यों खिसका? PNN24 की विशेष खोजी रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
PNN24 News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की यात्रा के दौरान नॉर्वे में हुआ एक हालिया घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोर के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के बाद, वहां की एक स्थानीय महिला पत्रकार हेला लेंग को प्रधानमंत्री मोदी से अपने सवाल का कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा:
“भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी। वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर है।”

इस पूरे विवाद के बीच यह समझना जरूरी हो गया है कि पेरिस स्थित नॉन-प्रॉफ़िट संगठन ‘रिपोर्टर्स सां फ़्रोंतिए’ (RSF) द्वारा जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में आखिर नॉर्वे में ऐसा क्या खास है जो वह लगातार 10 वर्षों से दुनिया में शीर्ष पर बना हुआ है, जबकि भारत पिछले 5 वर्षों में 15 अंक नीचे खिसक कर 157वें स्थान पर पहुंच गया है।
📊 भारत बनाम नॉर्वे: वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स स्कोरकार्ड
आरएसएफ (RSF) पांच मुख्य इंडिकेटर्स के आधार पर 180 देशों का स्कोर और रैंकिंग तय करता है। दोनों देशों के ताज़ा स्कोर की तुलना इस प्रकार है:
| इंडिकेटर (Indicators) | नॉर्वे का स्कोर (Rank: 1) | भारत का स्कोर (Rank: 157) |
| राजनीतिक इंडिकेटर | 95.98 | 21.16 |
| आर्थिक इंडिकेटर | 87.22 | 32.63 |
| कानूनी इंडिकेटर | 91.76 | 39.59 |
| सामाजिक इंडिकेटर | 92.19 | 33.65 |
| सुरक्षा इंडिकेटर | 96.46 | 32.77 |
| 2026 में जेल में बंद पत्रकार | 0 | 2 |
🔍 आखिर नॉर्वे प्रेस की आज़ादी में दुनिया का ‘सिरमौर’ क्यों है?
आरएसएफ की रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्वे पांच में से चार इंडिकेटर्स में दुनिया में नंबर वन है। इसके पीछे वहां के मजबूत लोकतांत्रिक और सामाजिक ढांचे की बड़ी भूमिका है:
- मजबूत कानूनी ढांचा और अधिकार: नॉर्वे का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी और सार्वजनिक जानकारी पाने के अधिकार की पूरी गारंटी देता है। वहां का कानून पत्रकारों और उनके स्रोतों (Sources) की सुरक्षा को बेहद कड़ाई से सुनिश्चित करता है।
- राजनीतिक दखलअंदाजी से दूरी: नॉर्वे का मीडिया बेहद अनुकूल राजनीतिक माहौल में काम करता है। वहां के राजनेता असहज करने वाली खबरों को “फ़ेक न्यूज़” कहकर खारिज नहीं करते। सबसे खास बात यह है कि सांसद और मंत्री सार्वजनिक सहायता पाने वाले मीडिया संस्थानों के संपादकीय कामकाज में कोई दखल नहीं देते।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता और ‘ज़ीरो वैट’ नीति: समाचार मीडिया पर नॉर्वे सरकार की “ज़ीरो वैट” (Zero VAT) नीति है, जिससे मीडिया संस्थानों की गुणवत्ता और विविधता बनी रहती है। वहां के 42% लोग अच्छी पत्रकारिता के लिए स्वेच्छा से पैसे (Subscription) चुकाते हैं।
- पब्लिक ब्रॉडकास्टर का मॉडल: नॉर्वे में सबसे भरोसेमंद मीडिया संगठन ‘एनआरके’ (NRK) है, जो पहले अनिवार्य लाइसेंस फीस और अब राज्य के बजट से मिलने वाले एक विशेष ‘एनआरके टैक्स’ के जरिए चलता है, जिससे सरकार का इस पर कोई सीधा नियंत्रण नहीं रहता।
🌍 वैश्विक स्तर पर गिर रहा है प्रेस स्वतंत्रता का ग्राफ
आरएसएफ की ताज़ा रिपोर्ट आगाह करती है कि प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के 25 सालों के इतिहास में पहली बार दुनिया के आधे से ज़्यादा देश अब प्रेस की आज़ादी के मामले में ‘मुश्किल’ या ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गए हैं। इस साल 1 जनवरी 2026 से लेकर अब तक दुनिया भर में 14 पत्रकार मारे जा चुके हैं और 469 मीडिया वर्कर्स जेलों में बंद हैं, जो दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर पत्रकारिता को अपराध की तरह देखे जाने का चलन बढ़ रहा है।
📝 विशेष कॉलम: मोरबतियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

काका का नज़रिया: “बबुआ, प्रेस की आज़ादी कोई खैरात में मिलने वाली चीज़ नहीं है, ई तो उस समाज की नीयत पर तय होता है जहाँ का नेता आलोचना से नहीं डरता और जहाँ की जनता सच सुनने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करती है!”
आज ओस्लो में हुई इस कूटनीतिक नोकझोंक और महिला पत्रकार हेला लेंग के सोशल मीडिया पोस्ट पर गरमागरम बहस छिड़ी थी। काका ने अपनी मोरबतियाँ सुलझाते हुए चश्मे के ऊपर से कड़क नजरों से देखा।
काका बोले: “बबुआ, कूटनीति के मंच पर ‘भारत महान है’ कहकर विदेशी चिंताओं को खारिज कर देना तो हमारी सरकारी मजबूरी और शान है, लेकिन आईने के सामने खड़े होकर अपनी कमियों को देखना भी तो बहादुरी है। नॉर्वे की पत्रकार ने कह दिया कि हमारा देश नंबर एक पर है और भारत 157 पर है। अब इस आंकड़े को देखकर हमारे देश के कुछ लोग भले ही विदेशी साजिश का राग अलापने लगें, लेकिन असलियत ये है कि नॉर्वे में राजनेता पत्रकारों को ‘फेक न्यूज’ का तमगा देकर किनारे नहीं करते। वहाँ का नेता असहज सवालों पर मुंह फेरने के बजाय जवाबदेही पर भरोसा रखता है।”
मैंने पूछा— “काका, आरएसएफ की रिपोर्ट कह रही है कि दुनिया के आधे देशों में पत्रकारिता अब मुश्किल दौर में है, तो भारत की इस स्थिति का क्या असर होगा?”
काका का जवाब: “असर साफ है बबुआ! जब देश में राजनीतिक इंडिकेटर का स्कोर सिर्फ 21.16 रह जाए, तो समझ लो कि चौथे खंभे की नींव कमजोर हो रही है। नीदरलैंड के पीएम ने चिंता जताई तो हमारे विदेश मंत्रालय ने कह दिया कि उन्हें जानकारी नहीं है, लेकिन जब खुद हमारे देश के पत्रकार सवाल पूछने के लिए तरस जाएं, तो उस पर क्या कहेंगे? बनारस की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, लोकतंत्र की खूबसूरती बड़े-बड़े भाषणों में नहीं, बल्कि उन तीखे सवालों में होती है जो सत्ता को सचेत रखते हैं; नॉर्वे से कूटनीति जरूर करिए, लेकिन उनकी प्रेस की आज़ादी वाले कानून की थोड़ी सी हवा भी अपने देश में आने दीजिए’।”












