‘सपा में मुस्लिम कयादत: सिर्फ वोट बैंक या नेतृत्व में भी हिस्सेदारी? आज़म खान से लेकर नियाज़ अली “मंजू”, सय्यद नईम तक, हाशिए पर खड़े नेताओं की कडवी अनकही दास्तां…!’
समाजवादी पार्टी में मुस्लिम नेतृत्व की जमीनी हकीकत पर PNN24 का विशेष विश्लेषण। अखिलेश यादव का आज़म खान को याद करना क्या महज चुनावी दांव है? वाराणसी से लेकर प्रदेश स्तर तक मुस्लिम नेताओं की 'पायदान' वाली राजनीति और नियाज़ अली 'मंजू' जैसे वक्ताओं के हाशिए पर जाने की इनसाइड स्टोरी।

तारिक आज़मी
वाराणसी/लखनऊ (PNN24 News): लंबे समय की खामोशी के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव ने वरिष्ठ नेता आज़म खान को याद किया है। मुर्गी चोरी से लेकर कई गंभीर आरोपों में जेल काट रहे आज़म खान और उनके परिवार को लेकर पार्टी नेतृत्व की यह ‘चुनावी सक्रियता’ मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की कवायद मानी जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सपा में मुस्लिम नेता सिर्फ भीड़ बढ़ाने का हिस्सा हैं?
1. पायदानों की सियासत: कद छोटा, वोट बड़ा
समाजवादी पार्टी का कोर वोटर मुस्लिम समाज है, लेकिन नेतृत्व के मामले में हकीकत कुछ और ही बयां करती है:
- आज़म खान: मुलायम सिंह यादव के करीबी होने के बावजूद इन्हें पार्टी में तीसरे पायदान का नेता माना गया।
- सोलंकी परिवार: मुश्ताक और इरफ़ान सोलंकी जैसे नेता, जिनका अपना मजबूत वोट बैंक है, वे भी शीर्ष पायदान की दहलीज तक नहीं पहुँच सके।
- अब्दुल कलाम: वाराणसी के इस कद्दावर नेता ने निर्दल 42 हजार वोट पाकर अपनी ताकत दिखाई थी, लेकिन सपा में उनकी पहुंच चौथे-पांचवें पायदान से आगे नहीं बढ़ी।
2. अनुशासनहीनता या अधिकार की मांग?
पूर्व सपा नेता नियाज़ अली ‘मंजू’ का उदाहरण पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करता है। एक प्रखर वक्ता के रूप में भीड़ जुटाने वाले मंजू ने जब इलाहाबाद की सभा में मुस्लिम भागीदारी और परिवारवाद पर सवाल उठाया, तो उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर कर दिया गया। आज वह बसपा के रास्ते होते हुए शिवपुर विधानसभा से अपनी जमीन तलाश रहे हैं।
3. वाराणसी: समर्पित चेहरों की अनदेखी
बनारस की राजनीति में कई मुस्लिम चेहरे सपा के लिए जेल गए और लाठियां खाईं, मगर उन्हें उचित फल नहीं मिला:
- सय्यद नईम: पूर्व पार्षद और बेहतरीन वक्ता होने के बावजूद उन्हें कभी महानगर अध्यक्ष तक नहीं बनाया गया।
- समद अंसारी: पूर्व विधायक और पार्टी के प्रति समर्पित होने के बाद भी जिला इकाई में दूसरे पायदान से ऊपर नहीं दिखते।
- बाबू अकेला, दिल्लू और आदिल: इन नेताओं को आज भी अपने क्षेत्र में पार्षद टिकट के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
4. अल्पसंख्यक सभा की बेबसी
हकीकत यह है कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में पार्षद टिकट के लिए भी अल्पसंख्यक सभा की राय नहीं ली जाती; टिकटों का फैसला महानगर अध्यक्ष ही फाइनल करते हैं। 2022 के निकाय चुनाव में टिकट वितरण को लेकर हुई खींचतान और वायरल वीडियो इसकी तस्दीक करते हैं।
📝 विशेष कॉलम: मोरबत्तियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

काका का नज़रिया: “बबुआ, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला दौर पुराना हुआ, अब तो जिसकी भीड़ उसका वोट वाला खेल है; पर अफ़सोस कि भीड़ जुटाने वाले हाथ कभी ‘रिमोट’ तक नहीं पहुँच पाते!”
सपा और मुस्लिम नेतृत्व के इस पेचीदा रिश्ते पर काका ने रजनीगंधा खाते हुए गहरी बात कही।
काका बोले: “बबुआ, अखिलेश बाबू का आज़म खान को याद करना वैसे ही है जैसे प्यास लगने पर कुआँ खोदना। जब तक आज़म साहब का परिवार जेल में था, तब तक ‘सैफई’ में सन्नाटा था। अब चुनाव करीब है तो यादें ताज़ा हो रही हैं। नियाज़ अली मंजू जैसन वक्ताओं का इस्तेमाल सिर्फ महफिल सजाने के लिए हुआ, और जब उन्होंने हक माँगा तो उन्हें ‘बाहर’ का रास्ता दिखा दिया गया।”
मैंने पूछा— “काका, क्या वाराणसी में मुस्लिम नेताओं की स्थिति कभी बदलेगी?”
काका का जवाब: “मुश्किल है बबुआ! जब सय्यद नईम और समद अंसारी जैसे समर्पित लोगों को महानगर अध्यक्ष की कुर्सी नसीब नहीं हुई, तो बाकी तो सिर्फ झंडा ढोने के लिए हैं। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, जो पार्टी मुस्लिम मतों के सहारे खड़ी है, वहां का अल्पसंख्यक मोर्चा सिर्फ दरी बिछाने तक सीमित क्यों है?’ चुनाव में ईवीएम तक वोट ले आना एक बात है, पर दिल जीतना दूसरी बात।”
नोट: लेख में लिखे गए विचार लेखक के स्वतंत्र विचार है











